इसे मारो, नहीं तो ये हमको मार डालेगा

इसे मारो, नहीं  तो ये हमको मार डालेगा

     अपने डर पर यदि आदमी जीत हासिल कर ले तो वह सफल होकर दुनिया के लिये सबक बन जाता हैै। जब आदमी अपने को बिना सहारे के महसूस करता है तो तब जब आदमी कुछ बड़ा होता है तो वो महसूस करता है कि वो अपने आपको दूसरे लोगों से अलग पाकर और लोगों से डरकर अपने को समाप्त कर रहा हैं। धीरे-धीरे आदमी के वचनों ने उसे अवसाद का शिकार बनाना चालू कर दिया, एक दिन उसने सोचा  कि क्यों वह लोगों से डरकर अपने को समाप्त कर रहा हैं? उसके बाद से वो डर को मारना चालू कर देता है। आज ऐसे लोग सारे जग के सामने एक सही लेखक, वक्ता और सही पिता के रूप में सामने आकर बता चुके हैं कि उन्होंने अपने डर की मौत कर दी है। एक ब्यक्ति जो कि शारीरिक रूप से कमजोर हैं उसने अपनी एक पुस्तक के माध्यम से बताया कि- मुझे विभिन्न देशों के अनेक लोग बता चुके हैं कि अलग ही डर के कारण वे आत्महत्या तक के प्रयास कर चुके हैं। मैंने उन्हें कहा- कि आप डर की हत्या करें, अपनी नहीं। मुझे बिना हाथ और पैर के देखकर वे मेरी बात से सहमत होकर अपने डर को मारने में कामयाब रहे हैं। जितने लम्बे समय तक हम किसी गलत काम को टालते रहते हैं, उतने लम्बे समय में वह एक अनचाहे डर में बदल जाता है। यह डर अनेक बार आदमी के लिये बेहद खराब साबित होता है, इसलिये जिस काम से आपको डर लग रहा हो उसे कर दें, डर अपने आप समाप्त हो जायेगा। डर की वजह से आदमी का दिमाग नकारात्मक बात और नकारात्मक काम की ओर अग्रसर हो जाता है। जिससे डर को बल मिलता है। यही कारण है कि छात्र परीक्षा में असफल होने के डर से, रोजगार न मिलने के डर से और अन्य कामों में असफल होने के डर के कारण यह डर आदमियों से अनेक गलत कार्य कराता है।
 
     इसमें आत्महत्या और दूसरे लोगों की जान लेने जैसे गलत कार्य भी शामिल हैं। डर उस खतरनाक बिमारी की तरह है जो धीरे से आदमी के जीवन को समाप्त कर देता है, इसलिये डर को दूर भगाने के लिये यह बहुत तैयारी के साथ करें कि जिससे डर लगता है, डरने वाले काम को कर दिया जाय तो डर की मौत निश्चित है। इसके साथ ही आदमी यदि सकारात्मक विचारों के साथ डर का मुकाबला करे तो उसके अन्दर हीन भाव और नकारात्मक विचार नहीं पनप पाते और डर खत्म होने लगता है। अध्यात्म और सात्विक विचारों से परिपूर्ण आदमी के पास बेकार के डर नहीं पनपते हैं। किसी भी आदमी के अन्दर डर पैदा होना सदैव नकारात्मक विचारों की उत्पत्ति होना होता है। यदि कोई भी आदमी डर से बचना चाहता है तो उसे सदैव अपने कामों में मन लगाकर परिश्रम, लगन, निष्ठा व ईमानदारी के साथ सभी कामों को निर्धारित समयावधि में पूर्ण कर लेना ही वास्तविक जीवन से डर को पूर्ण रूप से खत्म करना है।

                                                                                                                               राजेश जोशी ।
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उत्तराखण्ड के लिये अफसोस करने की खबर ----


उत्तराखण्ड के लिये अफसोस करने की  खबर ----

     मुख्यमंत्री रावत स्टिंग मामले में हाई कोर्ट ने कहा कि उत्तराखण्ड में ईमानदारी नजर नहीं आ रही है। आखिर कहाँ चली गयी होगी ये ईमारदारी, उत्तराखण्ड से। क्योंकि ये तो देवभूमि है ईमानदारी को तो यहाँ हर जगह होना चाहिये और उसे खोजने की तो जरूरत ही नहीं पड़नी चाहिये। लेकिन जब यह हाई कोर्ट को ही नहीं मिल पा रही है तो आमजन को तो ये क्या ही मिल पाती होगी। ये उत्तराखण्ड राज्य के लोगों के लिये बहुत बड़ी शर्म की बात है की वहां के  हाई कोर्ट की ऐसी टिप्पणी आ रही हो। क्योंकि ईमानदारी को गायब करने में यहां के लोगों का बहुत बड़ा योगदान है। वैसे वर्तमान में यह कथन अपने आप में काफी बड़ा सत्य है कि उत्तराखण्ड से  ईमानदारी गायब हो चुकी है और रही सही गायब हो रही है।
     राजनीतिक स्तर पर तो इसे उत्तराखण्ड तो क्या पूरे देश में नहीं ढूंढा जा सकता कितने बड़े घोटाले हो चुके हैं, न्यूज चैनलों में ये ही खबर रहती है । नया मामला हो तो काफी चर्चाओं का जोर चलता है, इतने में कोई दूसरा घोटाला आकर उसे दबा देता है। उत्तराखंड में मुख्यमंत्री सीडी प्रकरण में साफ डीलें होती हुयी दिखाई दी। इन डीलों ने कई दिनों तक खबरों का रूप लिया धीरे-2 मामला शांत होता गया और आज शायद ही उस ओर हमारी नजर जाती है। खैर चलो राजनीति में तो ऐसा होता ही रहता है, हम लोग ये मान चुके हैं । वैसे भी ये तो रहा हाई लेबल वाला भ्रष्टाचार, जो कि करोड़ों में होता है।
     अब यदि कभी सरकारी आफिसों की बात करें जहां पर 500 या 1000 रूपये के घोटाले की बात, आम बातों में शामिल हो चुकी हो, आम लोगों का रोज ही इससे वास्ता पड़ता है। यहाँ पर आम जनता को भ्रष्टाचार से सबसे अधिक चोट लगती है। आज ये फैसन बन चुका है कि आमजन को किसी सरकारी आफिस से कोई भी काम करवाना है तो वहा पर बैठे सरकारी कर्मचारी (जिनको सरकारी भिखारी भी कहा जा सकता है) की चाय-पानी का खयाल करना पड़ता है। वर्तमान में काफी मुश्किल से ही कोई ऐसा सरकारी आफिस मिलेगा जहां पर घूस न चलती हो अपना काम करवाने के लिये इन सरकारी भिखारियों केे कटोरे में आम लोगों को इनकी मर्जी से कुछ डालना ही पड़ता है, भिखारियों के तो हमारे यहां कोई रेट नहीं होते लेकिन इनके तो रेट भी होते हैं और हिस्सेदारी भी। ये भिखारी छोटे-मोटे नोटों को लेना अपनी शान के खिलाफ मानते हैं। ये भिखारी चपराशी से लेकर अफसर तक हो सकते हैं और इनके कटोरों में डालने वाले जो लोग होते है वो है अधिकांसतया गरीब जनता। हां, आफिस से बाहर आकर रिश्वत देने वाला ब्यक्ति इन रिश्वत लेने वाले कर्मचारियों की सात से लेकर दस,ग्यारह या ज्यादा पुस्तों को गालियां, बददुवा आदि देता हुवा निकलता है।
     आखिर यदि देखा जाये तो इन सबके के पीछे कौन जिम्मेदार है? क्या हम सभी उत्तराखंड के लोग नहीं! ये सब हमारी ही शह देने का नतीजा है और यह शह हम लोग देते आ रहे हैं और शायद आगे भी देते ही रहेंगे। ब्योंकि ये अब हमारी आदत में शुमार हो चुका है। अगर हम लोग इसे दूर ही करना चाहते तो क्या ये डील करने वाले नेता गण दुबारा से राजनीति करने की सोच अपने अंदर पैदा कर पाते। वैसे भी हमारे वर्तमान राजनेताओं ने राजनीति को इतना दूषित कर दिया है कि कोई भी छात्र क्या उसका अभिभावक क्या, राजनीति में जाना अपनी पहली प्राथमिकता नहीं बनाता बस एक धारणा बनती जा रही है कि राजनीति में जाना, वहां पर टिकना आमजन के लिये असंभव है। एक जमाना था कि आम से दिखने वाले श्री लाल बहादुर शास्त्री जी हमारे देश के प्रधानमंत्री पद तक पहुंच जाते थे, आज की परिस्थितियों में यदि इस बात पर गहराई से विचार क्या ऐसा आज संभव हो सकता है। शायद आज तो लाल बहादुर शास्त्री जी की विचार धारा का ब्यक्ति छोटा सा चुनाव नहीं लड़ सकता। किसी भी चुनाव में क्या खेल खेले जाते हैं हम सभी इससे भली भांति परिचित हैं। यदि इसका गहन विश्लेषण करना हो तो अपने आसपास होने वाले जिला पंचायत और विधान सभा के चुनावों का विश्लेषण कर लिया जाय,या कोई अन्य चुनाव, कहीं ज्यादा और कहीं कम, हर जगह ये ही खेल, खेले जाते हैं, फिर भी हम लोग इनको चुनाव कहते हैं।.--------------- इन परिस्थितियों में हाई कोर्ट को ईमानदारी कहां से नजर आयेगी।
     दूसरी ओर सरकारी आफिसों में चलने वाली घूस को भी हम ही लोगों ने बढ़ावा दिया है क्योंकि घूस देते तो हम ही हैं। न दें घूस, पकड़वायें इन सभी घूसखोरों को, आखिर यहां क्यों नहीं हम समूह बनाते हैं कि ये सब हमारे आसपास से दूर हो। वैसे इन को पकड़वाने की जो सरकारी की व्यवस्था है वो भी कुछ हद तक कठिन ब्यवस्था है, ऐसे ऑफिस चुनिंदा हैं और वो भी कुछ खास जगहों पर, और इससे कामकाजी आमजन लम्बे फेर में आ जाता है। वैसे यदि ईमानदारी देखने की चाहत हो तो इस ब्यवस्था को भी सरल बनाना होगा और आमजन को भी आगे कदम बढाने होंगे।अगर कदम बढ़ाये तो ईमानदारी आसपास ही नजर आ जाएगी।
     कुल मिलाकर यदि गंभीरता से विचार किया जाय तो हाई कोर्ट का न्यायाधीश प्रदेश में न्याय का देवता तुल्य, सर्वोच्च प्रतिनिधि है और उसके द्वारा कही गयी ऐसी बात से प्रदेश का सर शर्म से झुक जाना चाहिये, या कहा जा सकता है की काफी अफ़सोस होना चाहिए, और वो भी ऐसे न्यायाधीश के मुंह से निकली टिप्पणी, जिसके निर्णय देने की क्षमता और दिये गये निर्णयों का पूरे देश में सम्मान किया जाता है।
     खैर इससे भी बड़ी अफसोस की बात ये है कि न तो यहां के न्यूज चैनलों को इस खबर की गंभीरता से कोई मतलब है और न ही अखबारों को।


                                                                                                                                             राजेश जोशी।








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