ऐसी की तैसी ज्योतिषि की

ऐसी की तैसी ज्योतिषि की

 
     एक बार एक ब्यक्ति घूमता हुवा एक ज्योतिषि के घर के बाहर पहुँचा। घर काफी बड़ा और सुन्दर था जिसके बाहर शानदार मैदान था, चारों ओर करीब सात फिट की ऊँची बाउन्ड्री थी, प्रवेश गेट भी काफी शानदार था। कुल मिलाकर घर महल की तरह बनाया गया था। बाहर गेट के पास शानदार तरीके से लिखा हुवा एक बोर्ड टंगा हुवा था, जिस पर पेन्टर ने काफी आकर्षक तरीके से ज्योतिषि महाराज के बारे में जानकारी देने के साथ अन्य आवश्यक सूचनायें जैसे- ज्योतिषि सम्राट से मिलने का समय, उनका फोन नम्बर आदि के साथ उनकी डिग्रियों का भी बखान किया था।
    महल को देखने के बाद वह ब्यक्ति गेट की तरफ गया। रास्ते के दोनों ओर कई कारें और अन्य सवारी गाड़ियाँ भी खड़ी थी जिनमें वो लोग आये थे जिनको ज्योतिषि सम्राट से मिलना था। गाड़ियों के आने का सिलसिला जारी था। काफी संख्या में लोग गेट से अन्दर आ-जा रहे थे। आने वालों को अन्दर कहाँ जाना है, ये बताने के लिये गेट के पास एक ब्यक्ति खड़ा था।
    गेट के पास पहुँचकर वह ब्यक्ति वहाँ खड़े ब्यक्ति से बोला यहाँ अन्दर क्या है? गेट पर खड़े क्यक्ति ने कहा तुमको यहाँ के बारे नहीं पता! वह ब्यक्ति बोला नहीं। गेट वाले ब्यक्ति ने कहा ये फलाने ज्योतिषि सम्राट का घर है, काफी पहुँचे हुये ज्योतिषि हैं ये, इनकी कही गयी बात पत्थर पर खीचीं गई लकीर ही मानों। इतनी संख्या में लोग आते हैं कि इनको पानी पीने तक की फुर्सत नहीं रहती। भूत, भविष्य और वर्तमान के बारे में ये ब्यक्ति का माथा देखते ही बता देते हैं। किसी की कैसी भी मुसीबत हो ये चुटकी में दूर कर देते हैं। वह ब्यक्ति बोला अच्छा! गेट वाला ब्यक्ति फिर से बोला-ये अपने उपायों से किसी ब्यक्ति की मुत्यु तक को टाल देते हैं। रोज ही यहाँ पर लोग काफी सख्या में आते हैं। बोर्ड की ओर इशारा करते हुये बोला इनकी डिग्रियाँ के बारे में देखो हरिद्वार से ज्योतिषि ये डिग्री ली है, बनारस से ज्योतिषि के वो कोर्स किये हैं। आदि-आदि। उस क्यक्ति की जिज्ञासा बढने लगी उसने सोचा क्यों न ज्योतिषि सम्राट से मिल लिया जाय। वो गेट में खड़े ब्यक्ति से बोला-क्या मैं इनसे मिल सकता हूँ ? गेट पर खड़े ब्यक्ति ने कहा वैसे तो आज नम्बर आना मुश्किल है फिर भी आप अन्दर चले जाओ, यदि आज नम्बर नहीं आ पाये तो कल सुबह ही आ जाना। यह बोलकर गेट पर खड़े क्यक्ति ने बताया कि ये लोग जो अन्दर जा रहे हैं,ये वहीं जा रहे हैं। इनके पीछे-पीछे जाओ। अन्य लोग भी जो पहले यहाँ आये थे वो गेट वाले से पूछते कि महाराज जी बैठे हैं क्या? गेट पर खड़ा क्यक्ति किसी को हाँ कहता और किसी को इशारे से ही बता दे रहा था कि हाँ बैठे हैं। वह ब्यक्ति उन लोगों के पीछे हो लिया।
    अन्दर एक हालनुमा कमरे में एक ओर ज्योतिषि बैठे हुये थे और दूसरी ओर काफी संख्या में लोग बैठे हुये थे। जिसका नम्बर आता वो ज्योतिषि के पास जाता। करीब 10 से 15 मिनट तक बात करने के बाद वो ब्यक्ति ज्योतिषि को दक्षिणा देता और उनको बड़ी तन्मयता के साथ प्रणाम करता, इसके बाद अगले ब्यक्ति की बारी आ जाती।
    शाम के समय उस ब्यक्ति की भी बारी आ गयी। उसने भी जैसे अन्य लोग कर रहे थे उसी तरह ज्योतिषि को प्रणाम किया और सामने के आसन पर बैठ गया। ज्योतिषि ने काफी गौर से उसके माथे पर कुछ देर अपनी नजरें जमाये रखी और फिर उसका हाथ देखता हुवा बोला अपनी जनम कुंडली भी लाये हो। उस क्यक्ति ने नहीं में जबाब दिया। कुछ देर हाथ देखने के बाद ज्योतिषि बोले कि राहु-केतु का दोष दिखाई दे रहा है और शनि भी भारी है जो काफी नुकसान करा सकता है। दोष मिटाने के लिये कुछ उपाय करने होंगे। फिर कुछ देर रूककर ज्योतिषि ने कहा दक्षिणा आदि मिलाकर कुल 5 से 7 हजार तक का खर्चा आयेगा इससे जो ग्रह तुम पर बुरा प्रभाव डाल रहे हैं वो शुभ प्रभाव डालने लग जायेंगे और हर प्रकार से तुमको लाभ पहुँचाने लगेंगे।
    पर मेरे पास तो पैसा नहीं है, महाराज। वह ब्यक्ति बोला।
    ज्योतिषि कुछ देर उस ब्यक्ति का चेहरे पर अपनी नजरें गणाई। फिर कुछ देर उस ब्यक्ति का अवलोकन करने के बाद बोले चलो तुम तीन हजार रूपये दे दो। तुम्हारा काम हो जायेगा।
    मेरे पास तो 3000 रूपये नहीं हैं। वह ब्यक्ति बोला।
    ज्योतिषि के पास बड़े-बड़े लोग आते थे और वो ऐसा जबाब शायद सुनने के आदि नहीं थे। उन्होंने फिर गौर से उस ब्यक्ति को देखा। फिर बोले चलो मैं तुम्हें शार्टकट वाला उपाय बता देता हूँ। तुम सिर्फ मेरी दक्षिणा 1001 रूपया दे दो।
    मेरे पास 1001 रूपया नहीं है महाराज। वो ब्यक्ति बोला।
    ज्योतिषि अपने माथे पर बल पड़ बल डाला और फिर बोले- चलो तुम 500 रूपये ही दे दो।
    मेरे पास 500 रूपये नहीं है। वो ब्यक्ति बोला।
    पैसा कम करते-करतेे ज्योतिषि 5 रूपये तक आ गये। और पीछा छुड़ाने वाले अंदाज में बोले। चलो 10 रूपये भगवान की अगरबत्ती के लिये चढ़ा दो। मैं तुम्हें उपाय बता देता हूँ।
    वह ब्यक्ति फिर बोला। मेरे पास तो 5 रूपये भी नहीं है, महाराज।
    ज्योतिषि बोले अच्छा! तुम्हारे पास 5 रूपये भी नहीं हैं! तो क्या बिगाड़ लेंगे तुम्हारा राहु-केतु और क्या बिगाड़ लेगा तुम्हारा शनि। मजे करो। जाओ भइया प्रणाम।

                                                                                                                                          राजेश जोशी।

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इसे मारो, नहीं तो ये हमको मार डालेगा

इसे मारो, नहीं  तो ये हमको मार डालेगा

     अपने डर पर यदि आदमी जीत हासिल कर ले तो वह सफल होकर दुनिया के लिये सबक बन जाता हैै। जब आदमी अपने को बिना सहारे के महसूस करता है तो तब जब आदमी कुछ बड़ा होता है तो वो महसूस करता है कि वो अपने आपको दूसरे लोगों से अलग पाकर और लोगों से डरकर अपने को समाप्त कर रहा हैं। धीरे-धीरे आदमी के वचनों ने उसे अवसाद का शिकार बनाना चालू कर दिया, एक दिन उसने सोचा  कि क्यों वह लोगों से डरकर अपने को समाप्त कर रहा हैं? उसके बाद से वो डर को मारना चालू कर देता है। आज ऐसे लोग सारे जग के सामने एक सही लेखक, वक्ता और सही पिता के रूप में सामने आकर बता चुके हैं कि उन्होंने अपने डर की मौत कर दी है। एक ब्यक्ति जो कि शारीरिक रूप से कमजोर हैं उसने अपनी एक पुस्तक के माध्यम से बताया कि- मुझे विभिन्न देशों के अनेक लोग बता चुके हैं कि अलग ही डर के कारण वे आत्महत्या तक के प्रयास कर चुके हैं। मैंने उन्हें कहा- कि आप डर की हत्या करें, अपनी नहीं। मुझे बिना हाथ और पैर के देखकर वे मेरी बात से सहमत होकर अपने डर को मारने में कामयाब रहे हैं। जितने लम्बे समय तक हम किसी गलत काम को टालते रहते हैं, उतने लम्बे समय में वह एक अनचाहे डर में बदल जाता है। यह डर अनेक बार आदमी के लिये बेहद खराब साबित होता है, इसलिये जिस काम से आपको डर लग रहा हो उसे कर दें, डर अपने आप समाप्त हो जायेगा। डर की वजह से आदमी का दिमाग नकारात्मक बात और नकारात्मक काम की ओर अग्रसर हो जाता है। जिससे डर को बल मिलता है। यही कारण है कि छात्र परीक्षा में असफल होने के डर से, रोजगार न मिलने के डर से और अन्य कामों में असफल होने के डर के कारण यह डर आदमियों से अनेक गलत कार्य कराता है।
 
     इसमें आत्महत्या और दूसरे लोगों की जान लेने जैसे गलत कार्य भी शामिल हैं। डर उस खतरनाक बिमारी की तरह है जो धीरे से आदमी के जीवन को समाप्त कर देता है, इसलिये डर को दूर भगाने के लिये यह बहुत तैयारी के साथ करें कि जिससे डर लगता है, डरने वाले काम को कर दिया जाय तो डर की मौत निश्चित है। इसके साथ ही आदमी यदि सकारात्मक विचारों के साथ डर का मुकाबला करे तो उसके अन्दर हीन भाव और नकारात्मक विचार नहीं पनप पाते और डर खत्म होने लगता है। अध्यात्म और सात्विक विचारों से परिपूर्ण आदमी के पास बेकार के डर नहीं पनपते हैं। किसी भी आदमी के अन्दर डर पैदा होना सदैव नकारात्मक विचारों की उत्पत्ति होना होता है। यदि कोई भी आदमी डर से बचना चाहता है तो उसे सदैव अपने कामों में मन लगाकर परिश्रम, लगन, निष्ठा व ईमानदारी के साथ सभी कामों को निर्धारित समयावधि में पूर्ण कर लेना ही वास्तविक जीवन से डर को पूर्ण रूप से खत्म करना है।

                                                                                                                               राजेश जोशी ।
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उत्तराखण्ड के लिये अफसोस करने की खबर ----


उत्तराखण्ड के लिये अफसोस करने की  खबर ----

     मुख्यमंत्री रावत स्टिंग मामले में हाई कोर्ट ने कहा कि उत्तराखण्ड में ईमानदारी नजर नहीं आ रही है। आखिर कहाँ चली गयी होगी ये ईमारदारी, उत्तराखण्ड से। क्योंकि ये तो देवभूमि है ईमानदारी को तो यहाँ हर जगह होना चाहिये और उसे खोजने की तो जरूरत ही नहीं पड़नी चाहिये। लेकिन जब यह हाई कोर्ट को ही नहीं मिल पा रही है तो आमजन को तो ये क्या ही मिल पाती होगी। ये उत्तराखण्ड राज्य के लोगों के लिये बहुत बड़ी शर्म की बात है की वहां के  हाई कोर्ट की ऐसी टिप्पणी आ रही हो। क्योंकि ईमानदारी को गायब करने में यहां के लोगों का बहुत बड़ा योगदान है। वैसे वर्तमान में यह कथन अपने आप में काफी बड़ा सत्य है कि उत्तराखण्ड से  ईमानदारी गायब हो चुकी है और रही सही गायब हो रही है।
     राजनीतिक स्तर पर तो इसे उत्तराखण्ड तो क्या पूरे देश में नहीं ढूंढा जा सकता कितने बड़े घोटाले हो चुके हैं, न्यूज चैनलों में ये ही खबर रहती है । नया मामला हो तो काफी चर्चाओं का जोर चलता है, इतने में कोई दूसरा घोटाला आकर उसे दबा देता है। उत्तराखंड में मुख्यमंत्री सीडी प्रकरण में साफ डीलें होती हुयी दिखाई दी। इन डीलों ने कई दिनों तक खबरों का रूप लिया धीरे-2 मामला शांत होता गया और आज शायद ही उस ओर हमारी नजर जाती है। खैर चलो राजनीति में तो ऐसा होता ही रहता है, हम लोग ये मान चुके हैं । वैसे भी ये तो रहा हाई लेबल वाला भ्रष्टाचार, जो कि करोड़ों में होता है।
     अब यदि कभी सरकारी आफिसों की बात करें जहां पर 500 या 1000 रूपये के घोटाले की बात, आम बातों में शामिल हो चुकी हो, आम लोगों का रोज ही इससे वास्ता पड़ता है। यहाँ पर आम जनता को भ्रष्टाचार से सबसे अधिक चोट लगती है। आज ये फैसन बन चुका है कि आमजन को किसी सरकारी आफिस से कोई भी काम करवाना है तो वहा पर बैठे सरकारी कर्मचारी (जिनको सरकारी भिखारी भी कहा जा सकता है) की चाय-पानी का खयाल करना पड़ता है। वर्तमान में काफी मुश्किल से ही कोई ऐसा सरकारी आफिस मिलेगा जहां पर घूस न चलती हो अपना काम करवाने के लिये इन सरकारी भिखारियों केे कटोरे में आम लोगों को इनकी मर्जी से कुछ डालना ही पड़ता है, भिखारियों के तो हमारे यहां कोई रेट नहीं होते लेकिन इनके तो रेट भी होते हैं और हिस्सेदारी भी। ये भिखारी छोटे-मोटे नोटों को लेना अपनी शान के खिलाफ मानते हैं। ये भिखारी चपराशी से लेकर अफसर तक हो सकते हैं और इनके कटोरों में डालने वाले जो लोग होते है वो है अधिकांसतया गरीब जनता। हां, आफिस से बाहर आकर रिश्वत देने वाला ब्यक्ति इन रिश्वत लेने वाले कर्मचारियों की सात से लेकर दस,ग्यारह या ज्यादा पुस्तों को गालियां, बददुवा आदि देता हुवा निकलता है।
     आखिर यदि देखा जाये तो इन सबके के पीछे कौन जिम्मेदार है? क्या हम सभी उत्तराखंड के लोग नहीं! ये सब हमारी ही शह देने का नतीजा है और यह शह हम लोग देते आ रहे हैं और शायद आगे भी देते ही रहेंगे। ब्योंकि ये अब हमारी आदत में शुमार हो चुका है। अगर हम लोग इसे दूर ही करना चाहते तो क्या ये डील करने वाले नेता गण दुबारा से राजनीति करने की सोच अपने अंदर पैदा कर पाते। वैसे भी हमारे वर्तमान राजनेताओं ने राजनीति को इतना दूषित कर दिया है कि कोई भी छात्र क्या उसका अभिभावक क्या, राजनीति में जाना अपनी पहली प्राथमिकता नहीं बनाता बस एक धारणा बनती जा रही है कि राजनीति में जाना, वहां पर टिकना आमजन के लिये असंभव है। एक जमाना था कि आम से दिखने वाले श्री लाल बहादुर शास्त्री जी हमारे देश के प्रधानमंत्री पद तक पहुंच जाते थे, आज की परिस्थितियों में यदि इस बात पर गहराई से विचार क्या ऐसा आज संभव हो सकता है। शायद आज तो लाल बहादुर शास्त्री जी की विचार धारा का ब्यक्ति छोटा सा चुनाव नहीं लड़ सकता। किसी भी चुनाव में क्या खेल खेले जाते हैं हम सभी इससे भली भांति परिचित हैं। यदि इसका गहन विश्लेषण करना हो तो अपने आसपास होने वाले जिला पंचायत और विधान सभा के चुनावों का विश्लेषण कर लिया जाय,या कोई अन्य चुनाव, कहीं ज्यादा और कहीं कम, हर जगह ये ही खेल, खेले जाते हैं, फिर भी हम लोग इनको चुनाव कहते हैं।.--------------- इन परिस्थितियों में हाई कोर्ट को ईमानदारी कहां से नजर आयेगी।
     दूसरी ओर सरकारी आफिसों में चलने वाली घूस को भी हम ही लोगों ने बढ़ावा दिया है क्योंकि घूस देते तो हम ही हैं। न दें घूस, पकड़वायें इन सभी घूसखोरों को, आखिर यहां क्यों नहीं हम समूह बनाते हैं कि ये सब हमारे आसपास से दूर हो। वैसे इन को पकड़वाने की जो सरकारी की व्यवस्था है वो भी कुछ हद तक कठिन ब्यवस्था है, ऐसे ऑफिस चुनिंदा हैं और वो भी कुछ खास जगहों पर, और इससे कामकाजी आमजन लम्बे फेर में आ जाता है। वैसे यदि ईमानदारी देखने की चाहत हो तो इस ब्यवस्था को भी सरल बनाना होगा और आमजन को भी आगे कदम बढाने होंगे।अगर कदम बढ़ाये तो ईमानदारी आसपास ही नजर आ जाएगी।
     कुल मिलाकर यदि गंभीरता से विचार किया जाय तो हाई कोर्ट का न्यायाधीश प्रदेश में न्याय का देवता तुल्य, सर्वोच्च प्रतिनिधि है और उसके द्वारा कही गयी ऐसी बात से प्रदेश का सर शर्म से झुक जाना चाहिये, या कहा जा सकता है की काफी अफ़सोस होना चाहिए, और वो भी ऐसे न्यायाधीश के मुंह से निकली टिप्पणी, जिसके निर्णय देने की क्षमता और दिये गये निर्णयों का पूरे देश में सम्मान किया जाता है।
     खैर इससे भी बड़ी अफसोस की बात ये है कि न तो यहां के न्यूज चैनलों को इस खबर की गंभीरता से कोई मतलब है और न ही अखबारों को।


                                                                                                                                             राजेश जोशी।








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ये दिल्ली है भईया....जरा संभल के


   ये दिल्ली है भईया....जरा संभल के 
 
      दिल्ली बस अड्डे के पास से ही अन्य जगहों के लिये प्राइवेट बसें चलती हैं। ये बस वाले लोग दूर जाने वाले यात्रियों को कई बार अच्छी -खासी परेशानी में डाल देते हैं। कई बार तो से यात्रियों को बीच में ही छोड़ देते हैं। जिससे उनको आगे अपने गंतब्य स्थान में पहुँचने में काफी दिक्कत हो जाती है। बस अड्डे के पास प्राइवेट बसों में बिठाने वाले लोग घूमते रहते हैं। जो लोग खासकर नये हों ये उनके पीछे ही पड़ जाते हैं कि वो उनकी बसों में बैठे और करीब-2 नये लोग ही इनके झांसे में आते हैं। जल्दी घर पहुँचने के चक्कर में फौज के लोग भी इनके साथ हो लेते हैं। मैं भी एक बार इनकी बस में दिल्ली से टनकपुर आने के लिए टिकट ले बैठा।
      बस में बिठाने वाले दो लोग स्टेशन पर ही कुछ यात्रियों से बहस कर रहे थे। ये लोग इन यात्रियों को अपनी बस में बिठाने की कोशिश में लगे हुये थे। यात्री कुछ नये लग रहे थे लेकिन वो इनकी बसों में नहीं जाना चाह रहे थे। फिर भी ये बस वाले उनको तरह-2 की बातों से लुभाने की कोशिश कर रहे थे।
      इन लोगों ने सामने ही खड़ी एक बस की ओर इशारा करके कहा कि वो बस जाने के लिये तैयार खड़ी है। कुछ लोग इनके साथ जाने के लिये तैयार हो गये। पहले इन लोगों सेे टिकट लेने को कहा। वो जितने भी लोग थे सबने टिकट ले लिया। इसके बाद इन लोगों ने सभी को बस के एक ओर खड़ा होने को कहा और अपना नये यात्रियों को खोजने जाने लगे। यात्रियों ने पूछा कि अभी तक तो आप कह रहे थे कि ये बस जाएगी, तो उनका जबाब था कि वो बस इससे पहले जाएगी।
      कुछ देर बाद वो लोग जो टिकट ले चुके थे उनमें से कुछ अब उन बस में बिठाने वालों के पास गए और उनसे  बस के बारे में पूछने लगे। वो लोग अब कहने लगे कि आप लोग वहीं पर खडे़ रहो जहाँ आप लोगों को बताया है,  बस कुछ देर में आ रही है। अब उनका बात करने का लहजा बदल गया था। क्योंकि अब वो लोग टिकट बेच चुके थे।
      सभी लोग काफी समय तक खड़े रहे। इस बीच नये यात्री भी आ रहे थे। ये बस वाले उनसे भी पैसा ले रहे थे और उनको टिकट पकड़ा दे रहे थे। नये यात्रियों को भी पुराने यात्रियों के साथ खड़ा होने को कहा जा रहा था। टिकट लिये हुये लोगों में से कुछ कह रहे थे कि इन बस वालों का कोई भरोशा नहीं है कहीं अंत में ये ना बोल दें कि अब गाड़ी नहीं जायेगी और ऐसी हालत में हम लोगों को सरकारी गाड़ी मिलने में मुश्किल हो जायेगी।
      काफी समय तक खड़े रहने के बाद कुछ लोग अपना टिकट वापस करना चाह रहे थे, लेकिन ये बस वाले लोग बोल रहे थे कि अब टिकट वापस नहीं होगा। टिकट लिये हुए व्यक्तियों में दो लोग साथ-2 थे। वे टिकट वापस लेने के लिये जोर करने लगे। उन दोनों की बस वालों से बहस होने लगी। बात हाथापाई तक पहुँच गयी। लेकिन बस वाले पैसा वापस नहीं कर रहे थे। इतने में बस वालों के कुछ और साथी भी आ गये। वो भी बोलने लगे कि पैसा वापस नहीं होगा। वो दोनों व्यक्ति जो अभी जक पैसा वापस माँग रहे थे वो भी चुप हो गये। क्योंकि बस वालों की संख्या ज्यादा हो गयी थी।
      कुछ देर बाद बस आ गयी। जिसमें कुछ यात्री पहले से बैठे थे, सभी लोगों को उसमें बैठने को कहा गया। टिकट में बस नंबर लिखे थे। टिकट लेते समय जिस व्यक्ति को जो सीट चाहिये थी उसके टिकट में वो नंबर लिख दिया था। ये सिर्फ यात्री कैसे भी टिकट ले लें इसलिये था। अब उन नंबरों का कोई मतलब नहीं रह गया था क्योंकि एक ही नंबर कई यात्रियों के टिकटों पर था और उन सीटों भी पर पहले से ही यात्री बैठे हुये थे।
      खैर बस भरने के बाद चल दी। सुबह करीब 3 बजे एक ढ़ाबे पर बस रूकी पता चला कि ये जगह खटीमा के पास ही है। अब बस वाले बोलने लगे कि बस आगे नहीं जायेगी। जबकि कुछ लोगों के पास आगे का टिकट था और कुछ यात्री पीछे के स्टेशनों पर उतर गये थे। अब इन लोगों से बहस करने से तो कुछ फायदा नहीं था। उल्टा अगर कोई यात्री कुछ बोले तो इनका बोलने का मिजाज ऐसा था कि ये लड़ाई के लिए तैयार हों, इसलिये सभी यात्री बस से उतर गये। इतनी सुबह-2 आगे के लिए बस भी मिलना मुश्किल था। सभी लोगों ने ऐसे ही खड़े-2 स्टेशन पर कुछ समय गुजारा और कुछ समय के बाद बसें आने लगी। कुछ लोग बसों से और कुछ लोकल जीपों से आगे के सफर के लिये बस स्टैंड की ओर जाने लगे। उस  बस में सफर कर रहे लोगों ने उस दिन सबक ले लिया और कहने लगे कि अब कभी इनकी बसों में नहीं जायेंगे चाहे कुछ देर इंतजार करना पड़ जाये, सरकारी बसों से ही जाना ठीक रहता है।
      वैसे हाल सरकारी बसों का भी कोई खास ठीक नहीं रहता,  हाँ इस लिहाज से काफी अच्छा रहता है कि चाहे यात्री कितने ही कम क्यों हों से गंतब्य स्थान तक पहुँचा ही देते हैं। लेकिन ये जहाँ पर खाना आदि खिलाने के लिये रोकते हैं वहाँ पर ये भी अपने दर्शन करवा ही देते हैं। खाने के होटलों से ड्राईवर और कंडक्टर को बस रोकने के लिये पैसा दिया जाता है और इसके साथ इनको खाना भी स्पेशल दिया जाता है, जो इन लोंगों के लिये अलग से बनाया जाता है। शराब के शौकीन हों तो उसका भी इंतजाम रहता है। अन्त में जाते समय टिप के रूप में पैसे का लिफाफा भी इनको पकड़ा दिया जाता है।
      इन होटलों में यात्रियों को पहले टोकन लेने को कहा जाता है उसके बाद खाने की टेबल पर टोकन के बदले खाने की थाली दी जाती है। कई बार क्या तक़रीबन हमेशा ही यहाँ पर ऐसा होता है कि पहली बार में जो खाना दे दिया जाता है उसी से गुजारा करना पड़ता है। क्योंकि खाना देने वाले दुबारा आते ही नहीं हैं। लोग आवाज दे-देकर थक जाते हैं लेकिन होटल वालों के कान में जूं नहीं रेंगता। सभी बसें तकरीबन एक ही समय में खाना खाने के लिये रूकती हैं। जबकि खाना खासकर रोटियां सीमित मात्रा में ही बनी रहती हैं और होटलों में काम करने वाले कारीगर व अन्य सभी लोग रोटी बनाने में लग जाते हैं। कुछ रोटियाँ बनती हैं तो वो इतने लोगों के लिये कुछ भी नहीं होती हैं। इसके बाद भी अगर नये ग्राहक आये तो ये उनको टोकन बेच देते हैं। इस सबसे बस के ड्राईवर-कंडक्टर को कुछ भी लेना-देना नहीं रहता है क्योंकि उनको तो जो वो चाहते हैं मिल ही जाता है। खाने की इस अव्यवस्था के चलते कुछ लोग घर से ही खाना लेकर चलते हैं वैसे भी इन होटलों में खाने का टोकन भी मंहगा रहता है। यहाँ पर ये होटल वाले कुछ सरकारी अफसरों को रिश्वद आदि देकर गाड़ी अपने ही होटल में रूके वो ब्यवस्था कर लेते हैं अर्थात सरकारी आदेश करवा लेते हैं, और ड्राईवर-कंडक्टर अगर चाहें भी तो वो अन्य जगहों पर खाने के लिये गाड़ी नहीं रोक सकते, उनको यहाँ पर हाजिरी लगानी ही होती है।
      इसी तरह की प्राइवेट बसें हमारे देश के पूर्वात्तर के राज्यों में भी काफी चलती हैं। मैं खुद अपनी फौज में सर्विस के दौरान वहाँ पर रहते हुये जैसे मणीपुर, त्रिपुरा आदि जगहों से छुट्टी आने-जाने में इन्हीं बसों से सफर करता था। गोवाहाटी से हर जगह के लिये ये बसें उपलब्ध हो जाती है । वहाँ पर ऐसा गदर नहीं होता, बल्कि उनकी काफी अच्छी व्यवस्था होती है। इन लोगों की तरह वो एक-2 यात्री के पीछे नहीं भागते हैं। व्यवस्था अच्छी होने के कारण एक दिन पहले ही इनकी बसों के टिकट बिक जाते थे। शायद वो गाना 'ये पूरब है पूरब वाले हर जान की कीमत जानते हैं' इसीलिए बना था। वहां पर टिकट में बस चलने का समय, स्थान और सीट नंबर दिया होता है जो एकदम सही होता है। बस के साथ उनके स्टाफ के जो सदस्य होते हैं वो यात्रियों से काफी तहजीब से बात करते हैं और रास्ते में भी अपने यात्रियों काफी अच्छे से खयाल रखते हैं । ऐसा नहीं कि नहीं कि एक बार टिकट बिक गया तो अपने नाटक शुरू कर दो इन दिल्ली वालों की तरह। शायद वो लोग अपने कारोबार को लम्बे समय तक चलाना चाहते हैं और वो इतनी अच्छी तरह पेश आते हैं कि जो ब्यक्ति उन बसों में यात्रा कर रहा हो वो अगली बार भी इन्हीं बसों से सफर करता है और दूसरों को भी इन्हीं से सफर करने की सलाह देता है।
      हालांकि तब वहाँ पर भी सरकारी बसें चलती हैं और उनका टिकट भी प्राइवेट बसों की तुलना में कम होता है। फिर भी लोग प्राइवेट बसों में ही सफर करना पसंद करते हैं। क्योंकि रात भर का सफर रहता है  और इनकी बसों की सीटें भी काफी अच्छी होती है व अन्य ब्यवस्थाएं भी काफी अच्छी रहती हैं।
     काश ये दिल्ली की प्राइवेट बसों को चलाने वाले उन लोगों से कुछ सीखते तो शायद एक-2 यात्री के पीछे भागने की जगह यात्री खुद ही इनके पास आते। लेकिन अफसोस इन लोगों ने ऐसा माहौल पैदा कर दिया है कि जो आदमी एक बार इनके चंगुल में फंस जाता हो और इनकी असलियत से वाकिफ हो जाता हो वो शायद दुबारा इन बसों से सफर करने के लिये कान ही पकड़ लेता होगा और जाहिर है कहीं पर मौका आने पर अपने परिचितों को भी इनका किस्सा जरूर सुनाता होगा।
      कई स्थानों पर मूली की खेती को अच्छा नहीं माना जाता है। उसकी जगह घनियाँ और मेथी की खेती करना अच्छा माना जाता है। क्योंकि मूली को सिर्फ एक ही बार उखाड़कर खाया जाता है जबकि धनियाँ और मेथी को तोड़-तोड़कर बार-बार खाया जा सकता है। एक पुरानी कहावत भी है कि ‘‘उखाड़कर खाने से तोड़ तोड़ कर खाना अच्छा होता है। उत्तराखंड में बुजुर्ग लोग अभी भी कहते हुए मिल जायेंगे 'इजा चूड़ी बेर खानों निक भयो'।क्योंकि ऐसे करके कई दिनों तक खाया जा सकता है।
      यहाँ पर ये दिल्ली के बस वाले एक ही बार खा जाने के चक्कर में रहते हैं। जबकि ऊधर पूर्वोत्तर के बस वाले अपने व्यवहार और व्यवस्था से बार-2 यात्रियों को आकर्षित कर लेते हैं।

                                                                                                                                             राजेश जोशी।
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कब हटेगी ये संध्या-----


कब हटेगी ये संध्या-----

 
     एक दिन शाम का वक्त हो रहा था। एक गाँव की कुछ लड़कियाँ गाँव के पास ही नदी में नहाने गयी और नहाने लगी। नदी की लहरों के साथ खेलते-2 शाम गहराने लगी। उन लड़कियों में से एक लड़की बोली कि जल्दी घर की ओर चलो, नही तो संध्या लग जायेगी। नदी के पास ही झाड़ियों में एक शेर था। उसने भी ये सुन लिया कि ‘‘जल्दी चलो नही तो संध्या लग जायेगी’’।
      लड़कियाँ नदी से बाहर निकली और जल्दी -2 गाँव की ओर जाने लगी। वो आपस में बातें करती हुयी जा रही थी कि आज उनको काफी देर हो गयी है, आज समय का पता ही नहीं चला अब जल्दी ही संध्या लग जायेगी। वो बातें ऐसे कर रही थी जैसे वो काफी चिन्तित हो गयी हों।
      शेर उनकी बातें काफी गौर से सुन रहा था। उसने सोचा पता नहीं ये संध्या कौन सी बला है कहीं उसे ही न लग जाये। शेर भी उन लड़कियों के पीछे-2 चल दिया।
      गाँव पहुँचने पर सभी लड़कियाँ अपने-2 घरों की ओर चली गयी।
      इधर शेर अकेला पड़ गया। अब वो कहाँ जाये? उसने इधर-उधर देखा लेकिन उसे अपने लिये कोई जगह नजर नहीं आयी। वो जगह की तलाश में इधर-उधर घूमने लगा।
      घूमते -2 वो शेर गधों के तबेले के पास पहुँच गया। शेर अब तक संध्या वाली बात को सोचते हुये काफी परेशान हो गया था। शेर गधों के तबेले में घुस गया और उसे अंदर गधों के बीच में एक जगह मिल गयी। शेर वहीं जाकर बैठ गया।
      शेर ने पूरी रात गधों के तबेले में गुजार दी। सुबह जब कुछ अंधेरा ही था तो गधों का मालिक तबेले में आया और उसने गघों पर बोझ लादना शुरू कर दिया।
      एक बोझ उसने अंधेरे में ही शेर की पीठ पर भी रख दिया। गधों को तो इसका अभ्यास था वो तो बोझ रखते हुये खामोश खड़े रहे। लेकिन शेर को तो इसका कोई भी अभ्यास नहीं था। बोझ रखते हुये वो अपनी जगह से कुछ हिला तो  मालिक ने अंधेरे में ही एक डंडा उस पर दे मारा। शेर भी अब खामोश हो गया।
      बोझ रखने के बाद गधों के मालिक ने गधों को बाहर की ओर हांकना शुरू कर दिया। गधे बाहर जाने लगे। शेर भी अंधेरे में उन गधों के बीच हो गया और बोझ उठाकर गधों के साथ-2 चलने लगा। मालिक उन सबके पीछे हो लिया।

      गधे अपनी धुन में चल रहे थे। न बायें देखना, और न दायें। शेर भी उनके बीच में चल रहा था।
      सुबह जब आस-पास दिखाई देने लगा तो रास्ते में झाड़ियों में बैठे दूसरे शेर ने देखा कि गधों के साथ शेर भी बोझा उठाकर उनके बीच में चल रहा है। सहसा उसे अपनी आँखों पर विश्वास नहीं हुवा। उसने अपनी आँखों को एक-दो बार मींचा और फिर देखने लगा। फिर भी उसे बोझ उठाया हुवा शेर दिखाई दिया।
      अब ये शेर रास्ते के किनारे-2 झाड़ियों के बीच चलता हुवा उस शेर के करीब जाने लगा और अपनी भाषा में सी-2 करते हुये बोझ वाले शेर का ध्यान अपनी ओर करने की कोशिश करने लगा।
      दूसरा शेर गधों की ही भाँति बोझ उठाकर चल रहा था। अचानक एक बार उसकी नजर झाड़ियों के अंदर चल रहे दूसरे शेर पर पड़ गयी। कुछ देर तो उसने उससे नजरें मिलाये रखी फिर उसने झटके से अपना ध्यान उससे हटा लिया और चलने लगा।
      झाड़ियों वाला शेर फिर झाड़ियों के बीच चलता हुवा अपनी भाषा में बोझ वाले शेर को पुकारने लगा। लेकिन उसका वही हाल था।
      कुछ देर बाद बोझ वाला शेर झाड़ियों के करीब से होता हुवा चलने लगा तो दूसरे शेर को उससे बात करने का मौका मिल गया। उसने पूछा कि क्या बात है भई? तू गधों के साथ बोझ उठाकर क्यों चल रहा है?
      बोझ वाला शेर धीरे से बोला- अरे यार मुझे संध्या लग गयी है। इस चक्कर में मुझे सुबह-सुबह एक डंडा भी पड़ गया है। तू यहाँ से भाग जा नहीं तो तुझे भी संध्या लग जायेगी और तेरा भी हाल मेरी तरह हो जायेगा।
      थोड़ी देर के लिये तो उस शेर का दिमाग चकराया और वो भी सोचने लगा कि पता नहीं ये संध्या क्या बला है? फिर थोड़ी देर सोच विचार करने के बाद उसने बोझ वाले शेर से कहा-कहीं तू पागल तो नहीं हो गया है?
      बोझ वाला शेर बोला-भाग जा मेरे भाई। ये संध्या बहुत खतरनाक होती है और ये जिसे लग गयी वो गया काम से। इसके चक्कर में मुझे जो डंडा पड़ा अभी तक उसका दर्द हो रहा है।
      झाड़ी वाला शेर बोला- अरे यार एक बार तू दहाड़, न ये संध्या रहेगी, न ये गधे रहेंगे और न गधों का मालिक रहेगा।
      बोझ वाला शेर उसकी बात मानने को बिल्कुल भी राजी नहीं हो रहा था। बस उसने एक ही रट लगाई हुयी थी जो वो दूसरे शेर से कह रहा था कि-भाई तू भाग जा। कहीं तुझे न लग जाये ये संध्या।
      दूसरा शेर झाड़ियों में उसके बराबर चलता हुवा उससे कहे जा रहा था कि एक बार दहाड़ तो सही।
      बोझ वाले शेर की बात तो समझ में नहीं आ रही थी। फिर भी दूसरे शेर के जोर करने और पीछे पड़े रहने के कारण उसने दहाड़ मार दी।
      अब न गधे रहे और न ही गधों का मालिक उसे अपने आस-पास नजर आया। उसने दुबारा दहाड़ मारने के साथ उछलते हुये अपना बोझ भी गिरा दिया। उसकी संध्या गायब हो गयी थी।
      इस बोझ वाले शेर की तरह ही हमारे नेताओं का हाल हो जाता है। चुनाव का समय ले लीजिये क्या-2 बोल़ते फिरते हैं और जनता को एक बार फिर से बेवकूफ बना देते हैं। जनता फिर उन पर विश्वास कर लेती है कि चलो इस बार तो ये सब ठीक कर ही देंगे।
   
      चुनाव जीतने के बाद जब ये अपने पद की शपथ लेते हैं तो ये संध्या की चपेट में आ जाते हैं और भूल जाते हैं कि जनता ने उनको अपना प्रतिनिधि बनाया है और अपने किये हुये सारे वादों को भुलाकर पुरानी सरकार को कोसते हुये, घोटालों के पुराने रिकार्डों को तोड़ने में लग जाते हैं और इस कोशिश में लग जाते हैं कि उनके घर तो भर जायें। फिर अगले चुनावों के खर्च की ब्यवस्था भी तो उनको करनी होती है।
      अब इनकी संध्या कैसे भागे? कौन भगाये उसे? साथ के नेताओं का और बुरा हाल रहता है। अगर विपक्ष इस मामले में काम करे और कहीं इनकी संध्या उतर जाये तो अगले चुनावों में भी विपक्ष की हार निश्चित है। क्योंकि ये नेता अच्छा काम करने लगे तो अगले चुनावों में भी उनकी जीत पक्की है। ये बात विपक्ष किसी हाल में बर्दाश्त नहीं करना चाहता। इसलिये विपक्ष तो ज्यादा से ज्यादा उसे संध्या की ओर धकेलने की कोशिशों में लगा रहता है।
      काश कैसे ही सही ये नेता दहाड़ देते तो क्या समस्या है कश्मीर या अन्य किसी आतंकवाद की। रास्ते खुद ब खुद निकल आते। अगर ना निकल पायें तो वो क्षमता भी है हमारे पास जिससे न आतंकवादी रहते न उनके आका रहते और न वो मुल्क रहता जो आतंकवाद का शह दे रहा है। इसके साथ-2 भ्रष्टाचार जो  हमारे देश में मजबूती से अपनी जड़ जमाये हुए है। ये नेता गण पीछे पड़ जाते कि कैसे ये सब जड़ से समाप्त हो।
  ऐसा ही कुछ हाल हमारे देश के वर्दीधारी हुक्मरानों का हो जाता है। अक्सर फौज में किसी यूनिट में कोई सीनियर अफसर आता है तो वो दरबार लेता है और वो बोलने लगता है पता नहीं वो क्या-2 कर देगा। नीचे के रैंक के आदमी उसके झांसे में आ जाते हैं। क्योंकि उनको भी जनता की ही तरह उसके झांसे में आना अच्छा लगता है। वो भी सोचने लगते हैं काफी समय से वो जैसे अफसर चाह रहे थे उनको इस बार वैसा अफसर मिल गया है। लेकिन कुछ ही दिनों में से भी संध्या की चपेट में आ जाता है। इसके कारण अब वो-
1- जवानों की समस्या सुलझाने की जगह गाली-गलौज पर उतर जाता है।
2- आपरेशनों में कम से कम या बिल्कुल नहीं जाता है।
3- अपने क्षेत्र और अपनी पोस्टों की स्थिति जाकर देखने के स्थान पर कागजों के आधार पर ही निर्णय लेने लगता है।
4- जिस क्षेत्र में उसको निर्णय लेने हैं उसके पास उस क्षेत्र की समुचित जानकारी ही नहीं होती।
5- वो लोग जो ईमानदारी से अपना काम करते हैं उनको नीचा दिखाने की फिराक में लगे रहता है।
6- बोर्डर पर तस्करी कराने लगता है।
7- आत्मसमर्पण करने वाले आतंकवादियों और कई बार तो निर्दोष लोगों को मारकर अपनी बहादुरी का ढिढोरा पीटने लगता है।
8- शरीफ लोगों पर रौब दिखाने लगता है और बेईमान और आतंकवादियों से हाथ मिला लेता है।
      कुछ ऐसा ही हाल हमारे देश की पुलिस ब्यवस्था का हो जाता है।
      ये लोग दहाड़ देते तो क्या आतंकवादी घटनायें घट सकती हैं? और क्या आतंकवादी अपने नापाक मकसदों में कामयाब हो पाते? ......... कभी नहीं, बल्कि आतंकवादी पैदा ही होना बंद हो जायेंगे।
      एक दृष्टि क्यों न सरकारी नौकरी करने वालों पर डाल लें। क्योंकि देश को सुचारू रूप से चलाने में इनका भी अहम योगदान होता है। सरकार की कार्यप्रणाली और नीतियों को आम जनता तक ये ही पहुँचाते हैं। लेकिन यहाँ भी संध्या आ पहुँचती है। जिसके कारण ये-
1- भ्रष्टाचार में लिप्त हो जाते हैं।
2- सरकार द्वारा दी गयी शक्तियों का दुरूपयोग करने लगते हैं।
3- सरकार की नीतियों को आम आदमी तक पहुँचने ही नहीं देते हैं।
4- गरीब और असहाय लोगों को मिलने वाली सहायता को खुद ही डकार जाते हैं।
5- अन्य अनुचित तरीकों से पैसा कमाने की फिराक में लगे रहते हैं।
      ये दहाड़ देते तो शायद हमारे देश से गरीबी, भुखमरी आदि दूर हो जाती। इन सबको दहाड़ता देखकर शायद वो जड़बुद्धि लोग भी होश में आ जाते जो धर्म, जाति, ऊँच-नीच व अन्य दूषित विचारों द्वारा समाज के लोगों को एक-दूसरे से दूर करने के फिराक में लगे रहते हैं।
      इस सबके बावजूद, इन लोगों में जो ईमानदार और कर्तब्य निष्ठ लोग हैं उनकी बदौलत हमारा देश दुनियाँ में काफी अच्छा नाम रखता है।

      क्या ही अच्छा हो जाता कि ये संध्या लगे हुये सभी लोग दहाड़ देते और उन लोगों में शामिल हो जाते जो ईमानदार और कर्तब्यनिष्ठ हैं। अगर ऐसा हो जाये, तो क्या बुलन्दियाँ हमसे पीछे नहीं रह जायेंगी? और तब शायद किसी विकसित देश से हमें अपने देश की तुलना करने की आवश्यक्ता नहीं पड़ती।
      शायद तब विश्व के अन्य देश भी हमारा अनुशरण करते और एक बेहतरीन दुनियाँ का विकास हो पाता। इस हसीन दुनियाँ को बनाने में हमारा देश एक नींव का पत्थर कहलाता।

राजेश जोशी।

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मोदी सरकार के पास आरक्षण पर वास्तविक उपलब्धि हासिल करने का अवसर

Bhar Mein Jaye Janta….!!!!!! - #Politics Trolls

मोदी सरकार के पास आरक्षण पर वास्तविक उपलब्धि हासिल करने का अवसर

                                                                                                                                                                    आरक्षण, एक ऐसा विषय जिसे लेकर हर उस व्यक्ति में आक्रोश देखने को मिल जाता है जिसे आरक्षण नहीं मिलता। क्योंकि आरक्षण से आशय पिछड़े वर्गों न कि पिछड़े हुये ब्यक्तियों को मिलने वाली कुछ सुविधाओं से है जिससे यह अर्थ निकाल लिया जाता है कि इन वर्गों को सरकारी नौकरी में स्थान काफी आसानी से मिल जाता है। चाहे हकीकत कुछ भी हो। वैसे भारत में आरक्षण दिये जाने के पीछे यही आशय था देश में समानता आ सके जिसके लिये इन पिछड़े हुये वर्गों के लोगों को कुछ सुविधायें संविधान द्वारा दी गयी जिसमें शिक्षा व नौकरी के क्षेत्र में कुछ स्थान इन लोगों के लिये आरक्षित कर दिया जाना भी शामिल था। वर्तमान में कुछ समुदाय अपने आपको भी इस लाभ को दिये जाने की बातें करते हैं और इसके लिये प्रयत्नशील हो जाते हैं इनके प्रयत्न के क्षेत्र धरना, प्रदर्शन, जुलूस, हड़ताड़ और इससे आगे बढ़कर उग्र प्रदर्शन करना व देश की बहुमूल्य संपदा को क्षति पहुँचाना शामिल है। कुछ समुदाय आरक्षण मुक्त भारत की बात करते हैं।
    भारत में आरक्षण देने का आशय नीति निर्माताओं की यही सोच रही होगी कि समाज में  पिछड़ा वर्ग आगे बढ़ सके और तमाम किस्म की असमानताओं के बीच समानता का बीज पनप सके। आजादी के समय में समाज में विषमता इस कदर हावी थी कि डा0 अम्बेडकर जो कि संविधान के स्वयं नीति निर्माता रहे, उनको भी इन ऊँच-नीच और सामाजिक भेदभावों के कारण अपना धर्म बदलना पड़ा था।
    क्या आजादी के सात दशक बीत जाने के बाद भी जिस कारण से आरक्षण दिया गया कि समाज में समानता आ सके, वो आ पा रही है दूसरे शब्दों में कहा जाय तो क्या आने के करीब आ रही है? या समानता आने के बजाय दूर हो रही है। शायद दूर ही जा रही है। वर्तमान में भाजपा सरकार को इस विषय पर निष्पक्ष चिंतन के साथ एक मजबूत निर्णय लेकर इस मिसगाइडेड हो चुकी मिसाइल को गाइड करने का अवसर है।
    अब बात यहाँ पर आरक्षण की हो रही थी, लेकिन ये मिसाइल वाली बात कहाँ से आ गयी? इसका जबाब है कि जैसे हमारे बड़े-बड़े वैज्ञानिक होते हैं वो विभिन्न प्रकार के परीक्षण करते हैं, एक मिसाइल की ही बात ले ली जाय तो वो उसे बनाने से लेकर उसे उसके अंतिम लक्ष्य तक पहुँचाने में अपने जीवन भर की पढ़ाई लिखाई, रिसर्च व अन्य अनुभवों को लगाते हैं और कई बार उन्हें तक असफलता का मुँह देखना पड़ता है अर्थात् किन्हीं कारणों से मिसाइल लक्ष्य से भटक जाती है जबकि तमाम वैज्ञानिक उस पर निगरानी रख रहे होते हैं तब कहा जाता है कि परीक्षण सफल नहीं हो पाया। कई बार तो इस मिसाइल द्वारा जब नुकसान पहुँचने का अंदेशा हो तो वैज्ञानिक इस में लगी लागत आदि की परवाह न करते हुये इसे नष्ट कर देते हैं। इसमें उनके वैज्ञानिक होने की क्षमता पर सवाल नहीं उठाया जाता।
      अब एक दूसरा पक्ष देखते हैं- बचपन में पत्थर से निशाना लगाने का खेल तो तकरीबन हर कोई खेलता ही है और उसमें भी जब निशाना कहीं दूर लगाना हो और इसके लिये कोई पतला और छोटा पत्थर लिया जाता है तो उसे इस हिसाब से फैंकना होता है कि हवा आदि का हिसाब लगाते हुये पत्थर निशाने पर लगे। यहाँ पर यदि हवा का रूख, पत्थर की मोटाई व गोलाई का हिसाब ठीक से न लग पाये तो बड़े-बड़े निशानचीयों के पत्थर लक्ष्य से दूर चले जाते हैं। हम काफी आसानी से कह देते हैं कि तेरा निशाना तो बड़ा बेकार है या अब बड़ा बेकार हो गया है। यहाँ पर पत्थर फैंकने के बाद की चीजों पर फैंकने वाले का कोई नियंत्रण नहीं होता, और हो सकता है कि पत्थर फैंकने और उसके निशाने तक पहुँचने तक बीच की चीजें बदल जायें।
       अब आरक्षण का विषय आता है तो उसमें संविधान निर्माताओं ने समय-समय पर होने वाली समीक्षा की बात कही थी ताकि ये आरक्षण वाली मिसाइल मिसगाइडेड मिसाइल न होने पाये और अपने लक्ष्य की ओर सही रूप से बढ़ती रहे। ये पत्थर चलाने से इस बात में अलग है कि पत्थर को फैंकते समय सारा का सारा निशानेबाज का काम हो चुका होता है और फैंकने के बाद निशानेबाज के हाथ में कुछ नहीं होता सिवाए पत्थर को देखने के, चाहे वह निशाने की ओर जाये या न जाये। जबकि ये बात मिसाइल वाली बात से इस प्रकार से समानता रखती है कि मिसाइल छूटने के बाद उस पर तमाम तरह से वैज्ञानिक अपना नियंत्रण रखते हैं। इसी प्रकार इस आरक्षण नामक विषय पर भी हमारे नीति निर्माताओं ने यही सोचा होगा कि जो आगे के नीति निर्माता होंगे वो वैज्ञानिकों द्वारा जिस प्रकार मिसाइल पर नियंत्रण रखा जाता है उसी तरह का नियंत्रण रखेंगे न कि पत्थर फैंकने की तरह इसको देखते रहेंगे। वर्तमान में हमें पहले ये समझना होगा कि आरक्षण एक मिसाइल है न कि फैंका गया एक पत्थर।
    एक विद्वान का कथन कि अगर तुम किसी समुदाय को निष्क्रिय कर देना चाहते हो तो उसे अतिरिक्त सुविधायें उपलब्ध करा दो। क्योंकि सुविधाओं के मोह में वो इस कदर उलझ जायेगा कि उसे अपने कर्तब्य पथ का ज्ञान नहीं रह पायेगा। इसके साथ-साथ दूसरे एक विद्वान का कथन कि किसी पेड़ की डाल को छूने के लिये ब्यक्ति को ऊँचा उठना होता है न कि पेड़ की डाल को ही नीचे झुकाया जाता है। आरक्षण देते समय ऐसा नहीं है कि नीति निर्माताओं ने इन बातों की उपेक्षा की होगी। इतिहास देखें और अपने आस-पास के बुजुर्ग लोगों से हम तब के हालातों को समझ सकते हैं और तब हमें पता चलता है कि इन पिछड़े समुदायों ने कितना अत्याचार सहन किया जिसने इन्हें इतना मजबूर होना पड़ा कि ये हर क्षेत्र में पिछड़ते ही चले गये। अतः तब की परिस्थितियों में इनको ये लाभ देना आवश्यक हो गया था, लेकिन वर्तमान में इन पिछड़े वर्गों में भी जो क्रीमी लेयर बन चुकी है वो ही इसका लाभ ले रहे हैं जिनको इस लाभ की जरूरत है वो अपने जीवन जीने की मूलभूत समस्याओं में इस कदर उलझे रहते हैं कि अपनी योग्यता ही ऐसी नहीं बना पाते कि वो लाभ ले सकें और यदि योग्यता हासिल कर भी लें तो इस क्रीमी लेयर के लोगों के द्वारा पछाड़ दिये जाते हैं। वो लोग सिर्फ इस बात से ही संतोष कर ले रहे हैं कि चलो आरक्षण तो मिल ही रहा है और इसका लाभ इनके ही भाई-बन्धु उठा रहे हैं जबकि होना ये चाहिये था कि उन्हें भी चिंतित होना चाहिये था कि समाज का एक ऐसा वर्ग जो कुछ हद तक संपन्न है वो उन लोगों का लाभ ले रहा है जो इसके वास्तविक हकदार हैं। इसके साथ ये देखना भी आवश्यक है कि समाज में जो उच्च वर्ग के लोग हैं उनमें भी कुछ घोर अभावों में जीवन यापन कर रहे हैं, ऐसा अपने आसपास मुवाइना करके देखा जा सकता है।
     इसमें कोई शक नहीं है कि संविधान को बनाते समय जो आरक्षण की ब्यवस्था पिछड़े लोगों के लिये की गई थी वो समाज में उनको बराबरी के स्तर पर लाने के लिये नितान्त आवश्यक थी। गरीबी और अभावों के साथ इन वर्गोे को समाज में ब्याप्त ऊँच-नीच, छुवाछूत, शोषण व अत्याचारों से रोज ही दो-चार होना पड़ता था। लेकिन तब जो सुविधायें इन वर्गोे को दी गयी उनकी समय-समय पर ईमानदारी समीक्षा किया जाना आवश्यक था। जिसको करने में हमसे चूक होती रही और ये चूक वर्तमान तक जारी है, राजनीतिक दलों ने इसे वोट बैंक से जोड़कर देखना शुरू कर दिया और वर्तमान में हाल यह है कि इस पर विचार करने से पूर्व राजनीतिक दलों कोे अपनी कुर्सी गर्दिश में दिखाई देने लगती है। किसी भी देश के लिये इससे बड़ा दुर्भाग्य नहीं हो सकता जहाँ शासक वर्ग नीति बनाने से पहले अपनी कुर्सी की फिक्र करना शुरू कर दे।
     वर्तमान में जहाँ देखो कोई न कोई वर्ग आरक्षण की मांग पर लामबंद नजर आ ही जाता है। सरकारी नौकरी में आरक्षण को ही ले लिया जाय तो इसकी समीक्षा नितान्त आवश्यक हो जाती है। इसके साथ ये देखना भी आवश्यक है कि वास्तव में यह लाभ वंचित और गरीबी से जूझ रहे लोगों तक पहुँचे।
    आखिर आरक्षण का लाभ दिये जाने की समय सीमा का निर्धारण क्यों नहीं किया जा रहा है? ये प्रश्न हमारे नीति निर्माताओं की गैर जिम्मेदारी को दर्शाता है और साथ-साथ सत्ता से बेदखल हो जाने का उनका डर दिखाता है। चलिये मान लिया कि इससे पहले काफी समय से जोड़तोड़ की सरकारें रही है वहाँ पर उनकी इच्छा हो भी तो उनकी मौन धारण करने की मजबूरी समझ आ भी जाती है लेकिन वर्तमान भाजपा सरकार का इस पर मौन धारण करना सरकार की विफल समझ को ही दर्शाता है। बीच-बीच में यह बात सुनने में आ जाती है कि आरक्षण को समाप्त कर दिया जाये, फिर कुछ दूसरी बात कि आरक्षण आर्थिक आधार पर दिया जाना चाहिये। आदि-आदि। यहाँ पर अगर आरक्षण को समाप्त करने की बात आती है तो ये किया जाना ऐसे समाज में एक मूर्खतापूर्ण बात कही जा सकती है जहाँ अमीर और गरीब के बीच की खाई इतनी गहरी है कि इसको नापने का पैमाना ही नहीं मिलेगा। जहाँ एक ओर संसार के अरबपतियों की भारत में काफी अच्छी खासी संख्या है वहीं यहाँ पर भिखारियों को भीख माँगने के लिये अतिरिक्त मुहल्लों की जरूरत है, इसके साथ जहाँ एक ओर एशिया का सबसे धनी ब्यक्ति यहाँ मिल जायेगा तो दूसरी ओर देश की राजधानी में भूख से मरने वाले बच्चों के बारे में सुनने को मिल जाता है।
     दूसरी बात जो समय-समय  पर गली-मुहल्लों से लेकर सत्ता के गलियारों में भी सुनने को मिल जाती है कि आरक्षण को आर्थिक आधार पर दिया जाना। वर्तमान में ये देश के लिये अच्छी खबर है कि नीति निर्माता वर्ग का ध्यान भी इस ओर जा रहा है। इस बात में कोई दो राय नहीं है कि यदि आरक्षण आर्थिक रूप से लागू हो पाता है तो जो लोग आरक्षण मुक्त भारत की बात करते हैं वो लोग भी इसे समर्थन देते नजर आयेंगे या कहा जाय कि आरक्षण शब्द को ही भारतीय समाज में नयी पहचान मिल जायेगी। कुल मिलाकर वास्तव में जिसे आरक्षण का लाभ मिलना चाहिये अर्थात गरीब ब्यक्ति को उस तक आरक्षण की सीधी पहुँच हो जायेगी। क्योंकि गरीबी की कोई जाति, मजहब या धर्म नहीं होता, वो बस और बस गरीबी होती है, बाकी तो सब राजनीति होती है, वो भी गन्दी वाली।
     आज की राजनीति में निर्णयों को वोट बैंक को देखते हुये ही लिया जाता है और मोदी सरकार भी इससे अछूती नहीं है, हाँ मोदी सरकार अन्य पिछली सरकारों से इस बात में अलग है कि उसके पास स्पष्ट बहुमत है। कोई भी ठोस निर्णय लेने में बहुमत की सरकार को आसानी होनी चाहिये। पिछले कई वर्षों से आरक्षण के नाम पर सिर्फ राजनीति ही हो रही है, देश हित की नहीं। यहाँ पर निर्णय लेने के लिये सरकार की मंशा में देश हित प्रबल हो ये जनता द्वारा आशा की जा रही है। अभी तक का मोदी सरकार का अधिकांस वक्त कांग्रेस सरकार के निर्णयों को कोसने में ही बीता है या ये कहा जा सकता है कि अभी तक वो अंदर तक ये विश्वास नहीं जगा पायी है कि अभी कमान उसके हाथ में है। तमाम मिसगाइड हो चुकी मिसाइलों को गाइड करने में वो निर्णय ले सकती है, ये विश्वास उसे जगाने में देखते हैं कि उसे अभी कितना वक्त लगता है।
    निर्णय लेने के बाद भी उसे लागू किया जाना एक चुनौती भरा कार्य है। इसे ईमानदारी और पारदर्शिता से लागू किये जाने के लिये भी चुनौतियां भरी हुयी मिलेंगी। कहीं ऐसा न हो कि सरकारी आंकड़ों में फेरबदल करके कोई भी ब्यक्ति गरीब बन जाय। इस ब्यवस्था में भी ब्यापक सुधार की आवश्यक्ता है।

                                                                                                                                              राजेश जोशी।                    
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वर्तमान शासक वर्ग, नहीं-नहीं जी भगवान को प्यारे हो चुके राजे-महाराजे

वर्तमान शासक वर्ग, नहीं-नहीं जी भगवान को प्यारे हो चुके राजे-महाराजे




      अभी कुछ दिन पहले की ही बात है, यही कोई 10-20 दिन पहले की रही होगी कि उत्तराखंड में शासक वर्ग का तानाशाही भरा चेहरा देखने में आया या ये देखना नसीब हुवा भी कहा जा सकता है। इसके साथ एक ऐसा चेहरा भी सामने आया जो आज के दौर के इस ऊटपटांग माहौल में भी अपनत्व को खोज रहा था और न्याय की आशा कर रहा था। इत्तेफाक कुछ ऐसा रहा कि घटना का वीडियो तुरन्त ही वायरल हो गया।     

      एक महिला जो एक माँ है और अपने बच्चों की इकलौती अभिभावक है इसके साथ-साथ वो सरकारी महकमे में अध्यापन का कार्य भी करती है। पति की असमय मृत्यु के कारण जाहिर है कि काफी टूट गयी होगी और सिफारिश के अभाव में सालों से अपने बच्चों से दूर दुर्गम क्षेत्र में अपनी नौकरी कर रही है। इसके साथ वो ये भी देख रही है कि उसके डिपार्टमेंट में जो रसूखदार लोग हैं और जो अच्छी सिफारिश साथ में रखते हैं, वो आराम से अच्छी जगहों पर लगातार ही अपनी सर्विस कर रहे हैं जहाँ से वो अपनी ड्यूटी के साथ-साथ अपनी अन्य जिम्मेदारियों को भी बड़ी खूबी के साथ निभा ले रहे हैं। उस महिला को भी ये आशा जगती है कि चलो वो सिफारिश इत्यादि नही रखती लेकिन यदि वो अपनी लम्बी दुर्गम क्षेत्रों की नौकरी किये जाने को आघार बनाये और इसके साथ वो अपनी पारिवारिक स्थिति को बताती है तो हो सकता है कि बच्चों की परवरिश करने व उनको उचित मार्गदर्शन देने के लिये उसे भी ऐसी जगह पोस्टिंग मिल जाय जहाँ से वो अपनी सर्विस करने के साथ अपनी अन्य जिम्मेदारियों को उचित तरीके से पूरा कर सके।
     वो अपनी इस प्रयास के लिये मुख्यमंत्री के दरबार तक पहुँच गयी तो जाहिर है कि इससे पहले उसने काफी प्रयास किये होंगे जैसे पहले आॅफिस के क्लर्कों के चक्कर लगाये होंगे कि प्रार्थना पत्र अफसर तक पहुँचा दीजिये फिर अफसरों के आॅफिस के चक्कर लगाये होंगे कि उसका प्रार्थना पत्र आगे कर दिया जाय फिर आगे के आॅफिसों तक पहुँची होगी और यही गतिविधियाँ उन आॅफिसों में भी दुहरायी होंगी जैसा कि सरकारी आॅफिसों में होता है फिर ऊँचे ओहदेदारों तक सिफारिश लगाई होगी अन्य भी जो हथकन्डे होते हैं वो सारे अजमा लिये होंगे फिर भी उसे पोस्टिंग नहीं मिल पायी होगी। जब वो हर जगह से मायूस हो गयी होगी तो फिर नेताओं तक सिफारिश लगाई होगी फिर उनके चक्कर लगाये होंगे। अपने द्वारा किये गये प्रयासों से उसने परिणाम निकाल लिया होगा कि पोस्टिंग मिलना मुश्किल है और कई बार असंभव भी लग रहा होगा। वो काफी परेशान भी हो गयी होगी, उसकी आशाओं के टूटने का सिलसिला रूकने का नाम नही ले रहा होगा, सरकारी तंत्र को काफी कोशा भी होगा और कई बार पत्थर पलटा के आयी होगी (उत्तराखंड की कहावत कि जिस काम के लिये ऐड़ी चोटी का जोर लगा दिया हो और वो काम हो नही रहा हो वहाँ कहा जाता है कि तै बाटा म आब ढुंगो फलटा दिना अर्थात इस रास्ते में अब पत्थर पलटा देते हैं या इस काम को अब नहीं करेंगे)। कुल मिलाकर उसने कई बार हार मान ली होगी, लेकिन अपने बच्चों का भविष्य उसे हार नहीं मानने दे रहा होगा। थक हार कर वो सर्विस से ब्रेक लेकर घर भी बैठ गयी। उसे फिर से कोई रास्ता सूझ रहा होगा और फिर से आश जग रही होगी  और वो फिर से अपना प्रयास कर रही होगी। आखिरकार उसने सोचा होगा कि अब वो यह बात लेकर मुख्यमंत्री के दरबार में जायेगी आखिर दरबार लगता किसलिये है-लोगों की परेशानियाँ हल हो सकें, उन्हें कोई रास्ता मिल सके इसलिये तोे। ये तो वो बिल्कुल भी नहीं सोचती होगी कि ये दरबार शासन तंत्र अपनी रौब-धौब व तानाशाही दिखाने के लिये करता है।
                                 
     वो महिला मुख्यमंत्री के दरबार में पहुँचती है काफी बलवती आशा के साथ आखिर बलवती हो भी क्यों न आशा, भई मोदी जी ने काफी सोच विचार करके अच्छे दिन लाने के लिये कई योग्य विधायकों में से इन साहब को मुख्यमंत्री जो बनाया था क्योंकि जनता के सामने तो उनका चेहरा चुनाव के पहले रखा नहीं था इसलिये जनता द्वारा चुना गया मुख्यमंत्री कहना कुछ जंच नहीं रहा है। मोदी जी को योग्यता पसन्द है इस बात को भी कहा नहीं जा सकता क्योंकि योग्य तो दिल्ली के मुख्यमंत्री भी हैं क्योंकि दिल्ली की जनता ने उन पर दूसरी बार भरोशा दिखाया वो भी ऐसा भरोशा कि किसी अन्य को सीटें ही नसीब नहीं हुयी। दिल्ली की जनता जिसमें सारे देश के लोगों को शामिल किया जा सकता है और राजधानी के रहने वाले लोगों को काफी आसानी से बेवकूफ बनाना थोड़ा कठिन भी है अब ऐसे ब्यक्ति को दिल्ली में काम करने नहीं दिया जाता।

     काफी अपनत्व और जोर करने के तरीके का पुट ले कर महिला अपनी बात कहने लगी। लेकिन यह क्या? ये मुख्यमंत्री साहब तो अपने आपको बीते जमाने का कोई राजा समझ बैठे थे और पुराने राजा किस तरह अपने फरमान सुनाते थे शायद थोड़ी बहुत प्रैक्टिश उन्होंने अपने घर में शीशे के सामने बैठकर कर ही ली होगी। मुख्यमंत्री जी उस महिला को बात करने के तरीके व मर्यादा की नसीहत देने लगे। अरे भईया कोई बीमार ब्यक्ति जब किसी डाॅक्टर के पास जाता है तो डाॅक्टर उसे बीमारी बताने का तरीका न समझाकर उसकी बीमारी ठीक करने में अपना ध्यान देता है क्यों कि बीमारी ठीक हो जाने के बाद तो सारे तरीके उसे खुद ब खुद समझ आ जायेंगे। खैर इनको ये सब कौन समझाये---शायद ऊपर वाला क्योंकि नीचे किसी की अभी ये क्यों सुनेंगे?

     महिला तो अपनी समस्याओं से परेशान रही ही होगी मुख्यमंत्री जी को उस वीडियो में देखकर लग रहा था कि वो उस महिला से भी ज्यादा परेशान लग रहे थे शायद लोग उनको बीते जमाने के राजाओं सा सम्मान नही दे रहे होंगे या राजा नहीं समझ रहे होंगे या कोई और बात रही होगी।
     कहासुनी कुछ इस कदर बढ़ जाती है कि मुख्यमंत्री जी ने महिला को सस्पेंड करने का आदेश दे दिया और पुलिस को निर्देश दिया कि बाहर करो इसको। वो महिला अपने पर झपटती पुलिस को हटाते हुये इन सरकारी हुक्मरानों को कोसते हुये बाहर की ओर जाने लगी।

     घटना के बाद काफी न्यूज चैनलों के माध्यम से यह बात बतायी जाने लगी। उस महिला के मुताबिक वो काफी लम्बे समय से अपनी पोस्टिंग करवाने के लिये प्रयासरत है। फलाने ने उसे ये आश्वासन दिया आदि-आदि। ये सब बताते हुये महिला कई बार रो भी पड़ रही थी। खैर---
     मुख्यमंत्री जी ने ये जानना व इसके बारे में सोच विचार करना बिल्कुल भी उचित नहीं समझा कि सामने खड़ी महिला किसी परेशानी से गुजर रही होगी जिसके कारण उसे यहाँ तक आना पड़ा और जो अपनी परेशानी के चलते अपनी नौकरी न करके घर बैठने पर मजबूर हो रही है। इसके साथ जो भी ब्यक्ति यहाँ तक आता होगा इससे पहले वो हर जगह के धक्के खाने के बाद ही आता होगा, ये नहीं कि भईया मुसीबत आ गयी चलो मुख्यमंत्री के दरबार में। उस महिला की मनोस्थिति के बारे में भी मान्यवर ने ध्यान देना तक जरूरी नहीं समझा, अखबार में उनका इंटरब्यू पढा जिसमें वो महिला का मर्यादा में न होने की बात कर रहे थे। जैसा कि यह बात सर्वविदित है कि किसी भी ब्यक्ति से मर्यादित ब्यवहार की आशा की जाती है और की भी जानी चाहिये लेकिन जब कोई ब्यक्ति ब्यथित हो तो ये आशा कई बार अतिश्याक्ति की श्रेणी में भी आ जाती है। यहाँ पर यह बात भी देखने वाली है कि क्या तब मुख्यमंत्री का ब्यवहार मर्यादित था? शायद---
                                  
     सत्ता के अहंकार में डूबे मुख्यमंत्री जी का ध्यान शायद इस ओर नहीं जा रहा होगा कि जिस जनता के मतों से वो कुर्सी पा गये हैं यदि वो सस्पेंड करने पर आ जाय तो सत्ता पक्ष को विपक्ष की कुर्सी तक नसीब नहीं हो पाती। जैसा कि 2014 के लोक सभा चुनाव में कांग्रेस को विपक्ष में बैठने के लिये भी सीटें नसीब नहीं हुयी। काश ये सत्ता पक्ष इस सबक के साथ आगे बढता तो शायद हमारे देश के अच्छे दिन कुछ नजदीक आ पाते। वैसे अच्छे दिन कब से आने वाले हैं? ये तारीख तो मोदी जी बिना बताये ही 2014 का चुनाव जीत गये वो भी रिकार्ड बनाते हुए, वाह जी वाह।                                                                                                             
                                                                                                                                         राजेश जोशी
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