
मोदी सरकार के पास आरक्षण पर वास्तविक उपलब्धि हासिल करने का अवसर
आरक्षण, एक ऐसा विषय जिसे लेकर हर उस व्यक्ति में आक्रोश देखने को मिल जाता है जिसे आरक्षण नहीं मिलता। क्योंकि आरक्षण से आशय पिछड़े वर्गों न कि पिछड़े हुये ब्यक्तियों को मिलने वाली कुछ सुविधाओं से है जिससे यह अर्थ निकाल लिया जाता है कि इन वर्गों को सरकारी नौकरी में स्थान काफी आसानी से मिल जाता है। चाहे हकीकत कुछ भी हो। वैसे भारत में आरक्षण दिये जाने के पीछे यही आशय था देश में समानता आ सके जिसके लिये इन पिछड़े हुये वर्गों के लोगों को कुछ सुविधायें संविधान द्वारा दी गयी जिसमें शिक्षा व नौकरी के क्षेत्र में कुछ स्थान इन लोगों के लिये आरक्षित कर दिया जाना भी शामिल था। वर्तमान में कुछ समुदाय अपने आपको भी इस लाभ को दिये जाने की बातें करते हैं और इसके लिये प्रयत्नशील हो जाते हैं इनके प्रयत्न के क्षेत्र धरना, प्रदर्शन, जुलूस, हड़ताड़ और इससे आगे बढ़कर उग्र प्रदर्शन करना व देश की बहुमूल्य संपदा को क्षति पहुँचाना शामिल है। कुछ समुदाय आरक्षण मुक्त भारत की बात करते हैं।
भारत में आरक्षण देने का आशय नीति निर्माताओं की यही सोच रही होगी कि समाज में पिछड़ा वर्ग आगे बढ़ सके और तमाम किस्म की असमानताओं के बीच समानता का बीज पनप सके। आजादी के समय में समाज में विषमता इस कदर हावी थी कि डा0 अम्बेडकर जो कि संविधान के स्वयं नीति निर्माता रहे, उनको भी इन ऊँच-नीच और सामाजिक भेदभावों के कारण अपना धर्म बदलना पड़ा था।क्या आजादी के सात दशक बीत जाने के बाद भी जिस कारण से आरक्षण दिया गया कि समाज में समानता आ सके, वो आ पा रही है दूसरे शब्दों में कहा जाय तो क्या आने के करीब आ रही है? या समानता आने के बजाय दूर हो रही है। शायद दूर ही जा रही है। वर्तमान में भाजपा सरकार को इस विषय पर निष्पक्ष चिंतन के साथ एक मजबूत निर्णय लेकर इस मिसगाइडेड हो चुकी मिसाइल को गाइड करने का अवसर है।
अब बात यहाँ पर आरक्षण की हो रही थी, लेकिन ये मिसाइल वाली बात कहाँ से आ गयी? इसका जबाब है कि जैसे हमारे बड़े-बड़े वैज्ञानिक होते हैं वो विभिन्न प्रकार के परीक्षण करते हैं, एक मिसाइल की ही बात ले ली जाय तो वो उसे बनाने से लेकर उसे उसके अंतिम लक्ष्य तक पहुँचाने में अपने जीवन भर की पढ़ाई लिखाई, रिसर्च व अन्य अनुभवों को लगाते हैं और कई बार उन्हें तक असफलता का मुँह देखना पड़ता है अर्थात् किन्हीं कारणों से मिसाइल लक्ष्य से भटक जाती है जबकि तमाम वैज्ञानिक उस पर निगरानी रख रहे होते हैं तब कहा जाता है कि परीक्षण सफल नहीं हो पाया। कई बार तो इस मिसाइल द्वारा जब नुकसान पहुँचने का अंदेशा हो तो वैज्ञानिक इस में लगी लागत आदि की परवाह न करते हुये इसे नष्ट कर देते हैं। इसमें उनके वैज्ञानिक होने की क्षमता पर सवाल नहीं उठाया जाता।
अब एक दूसरा पक्ष देखते हैं- बचपन में पत्थर से निशाना लगाने का खेल तो तकरीबन हर कोई खेलता ही है और उसमें भी जब निशाना कहीं दूर लगाना हो और इसके लिये कोई पतला और छोटा पत्थर लिया जाता है तो उसे इस हिसाब से फैंकना होता है कि हवा आदि का हिसाब लगाते हुये पत्थर निशाने पर लगे। यहाँ पर यदि हवा का रूख, पत्थर की मोटाई व गोलाई का हिसाब ठीक से न लग पाये तो बड़े-बड़े निशानचीयों के पत्थर लक्ष्य से दूर चले जाते हैं। हम काफी आसानी से कह देते हैं कि तेरा निशाना तो बड़ा बेकार है या अब बड़ा बेकार हो गया है। यहाँ पर पत्थर फैंकने के बाद की चीजों पर फैंकने वाले का कोई नियंत्रण नहीं होता, और हो सकता है कि पत्थर फैंकने और उसके निशाने तक पहुँचने तक बीच की चीजें बदल जायें।
अब आरक्षण का विषय आता है तो उसमें संविधान निर्माताओं ने समय-समय पर होने वाली समीक्षा की बात कही थी ताकि ये आरक्षण वाली मिसाइल मिसगाइडेड मिसाइल न होने पाये और अपने लक्ष्य की ओर सही रूप से बढ़ती रहे। ये पत्थर चलाने से इस बात में अलग है कि पत्थर को फैंकते समय सारा का सारा निशानेबाज का काम हो चुका होता है और फैंकने के बाद निशानेबाज के हाथ में कुछ नहीं होता सिवाए पत्थर को देखने के, चाहे वह निशाने की ओर जाये या न जाये। जबकि ये बात मिसाइल वाली बात से इस प्रकार से समानता रखती है कि मिसाइल छूटने के बाद उस पर तमाम तरह से वैज्ञानिक अपना नियंत्रण रखते हैं। इसी प्रकार इस आरक्षण नामक विषय पर भी हमारे नीति निर्माताओं ने यही सोचा होगा कि जो आगे के नीति निर्माता होंगे वो वैज्ञानिकों द्वारा जिस प्रकार मिसाइल पर नियंत्रण रखा जाता है उसी तरह का नियंत्रण रखेंगे न कि पत्थर फैंकने की तरह इसको देखते रहेंगे। वर्तमान में हमें पहले ये समझना होगा कि आरक्षण एक मिसाइल है न कि फैंका गया एक पत्थर।
एक विद्वान का कथन कि अगर तुम किसी समुदाय को निष्क्रिय कर देना चाहते हो तो उसे अतिरिक्त सुविधायें उपलब्ध करा दो। क्योंकि सुविधाओं के मोह में वो इस कदर उलझ जायेगा कि उसे अपने कर्तब्य पथ का ज्ञान नहीं रह पायेगा। इसके साथ-साथ दूसरे एक विद्वान का कथन कि किसी पेड़ की डाल को छूने के लिये ब्यक्ति को ऊँचा उठना होता है न कि पेड़ की डाल को ही नीचे झुकाया जाता है। आरक्षण देते समय ऐसा नहीं है कि नीति निर्माताओं ने इन बातों की उपेक्षा की होगी। इतिहास देखें और अपने आस-पास के बुजुर्ग लोगों से हम तब के हालातों को समझ सकते हैं और तब हमें पता चलता है कि इन पिछड़े समुदायों ने कितना अत्याचार सहन किया जिसने इन्हें इतना मजबूर होना पड़ा कि ये हर क्षेत्र में पिछड़ते ही चले गये। अतः तब की परिस्थितियों में इनको ये लाभ देना आवश्यक हो गया था, लेकिन वर्तमान में इन पिछड़े वर्गों में भी जो क्रीमी लेयर बन चुकी है वो ही इसका लाभ ले रहे हैं जिनको इस लाभ की जरूरत है वो अपने जीवन जीने की मूलभूत समस्याओं में इस कदर उलझे रहते हैं कि अपनी योग्यता ही ऐसी नहीं बना पाते कि वो लाभ ले सकें और यदि योग्यता हासिल कर भी लें तो इस क्रीमी लेयर के लोगों के द्वारा पछाड़ दिये जाते हैं। वो लोग सिर्फ इस बात से ही संतोष कर ले रहे हैं कि चलो आरक्षण तो मिल ही रहा है और इसका लाभ इनके ही भाई-बन्धु उठा रहे हैं जबकि होना ये चाहिये था कि उन्हें भी चिंतित होना चाहिये था कि समाज का एक ऐसा वर्ग जो कुछ हद तक संपन्न है वो उन लोगों का लाभ ले रहा है जो इसके वास्तविक हकदार हैं। इसके साथ ये देखना भी आवश्यक है कि समाज में जो उच्च वर्ग के लोग हैं उनमें भी कुछ घोर अभावों में जीवन यापन कर रहे हैं, ऐसा अपने आसपास मुवाइना करके देखा जा सकता है।
इसमें कोई शक नहीं है कि संविधान को बनाते समय जो आरक्षण की ब्यवस्था पिछड़े लोगों के लिये की गई थी वो समाज में उनको बराबरी के स्तर पर लाने के लिये नितान्त आवश्यक थी। गरीबी और अभावों के साथ इन वर्गोे को समाज में ब्याप्त ऊँच-नीच, छुवाछूत, शोषण व अत्याचारों से रोज ही दो-चार होना पड़ता था। लेकिन तब जो सुविधायें इन वर्गोे को दी गयी उनकी समय-समय पर ईमानदारी समीक्षा किया जाना आवश्यक था। जिसको करने में हमसे चूक होती रही और ये चूक वर्तमान तक जारी है, राजनीतिक दलों ने इसे वोट बैंक से जोड़कर देखना शुरू कर दिया और वर्तमान में हाल यह है कि इस पर विचार करने से पूर्व राजनीतिक दलों कोे अपनी कुर्सी गर्दिश में दिखाई देने लगती है। किसी भी देश के लिये इससे बड़ा दुर्भाग्य नहीं हो सकता जहाँ शासक वर्ग नीति बनाने से पहले अपनी कुर्सी की फिक्र करना शुरू कर दे।
वर्तमान में जहाँ देखो कोई न कोई वर्ग आरक्षण की मांग पर लामबंद नजर आ ही जाता है। सरकारी नौकरी में आरक्षण को ही ले लिया जाय तो इसकी समीक्षा नितान्त आवश्यक हो जाती है। इसके साथ ये देखना भी आवश्यक है कि वास्तव में यह लाभ वंचित और गरीबी से जूझ रहे लोगों तक पहुँचे।
आखिर आरक्षण का लाभ दिये जाने की समय सीमा का निर्धारण क्यों नहीं किया जा रहा है? ये प्रश्न हमारे नीति निर्माताओं की गैर जिम्मेदारी को दर्शाता है और साथ-साथ सत्ता से बेदखल हो जाने का उनका डर दिखाता है। चलिये मान लिया कि इससे पहले काफी समय से जोड़तोड़ की सरकारें रही है वहाँ पर उनकी इच्छा हो भी तो उनकी मौन धारण करने की मजबूरी समझ आ भी जाती है लेकिन वर्तमान भाजपा सरकार का इस पर मौन धारण करना सरकार की विफल समझ को ही दर्शाता है। बीच-बीच में यह बात सुनने में आ जाती है कि आरक्षण को समाप्त कर दिया जाये, फिर कुछ दूसरी बात कि आरक्षण आर्थिक आधार पर दिया जाना चाहिये। आदि-आदि। यहाँ पर अगर आरक्षण को समाप्त करने की बात आती है तो ये किया जाना ऐसे समाज में एक मूर्खतापूर्ण बात कही जा सकती है जहाँ अमीर और गरीब के बीच की खाई इतनी गहरी है कि इसको नापने का पैमाना ही नहीं मिलेगा। जहाँ एक ओर संसार के अरबपतियों की भारत में काफी अच्छी खासी संख्या है वहीं यहाँ पर भिखारियों को भीख माँगने के लिये अतिरिक्त मुहल्लों की जरूरत है, इसके साथ जहाँ एक ओर एशिया का सबसे धनी ब्यक्ति यहाँ मिल जायेगा तो दूसरी ओर देश की राजधानी में भूख से मरने वाले बच्चों के बारे में सुनने को मिल जाता है।
दूसरी बात जो समय-समय पर गली-मुहल्लों से लेकर सत्ता के गलियारों में भी सुनने को मिल जाती है कि आरक्षण को आर्थिक आधार पर दिया जाना। वर्तमान में ये देश के लिये अच्छी खबर है कि नीति निर्माता वर्ग का ध्यान भी इस ओर जा रहा है। इस बात में कोई दो राय नहीं है कि यदि आरक्षण आर्थिक रूप से लागू हो पाता है तो जो लोग आरक्षण मुक्त भारत की बात करते हैं वो लोग भी इसे समर्थन देते नजर आयेंगे या कहा जाय कि आरक्षण शब्द को ही भारतीय समाज में नयी पहचान मिल जायेगी। कुल मिलाकर वास्तव में जिसे आरक्षण का लाभ मिलना चाहिये अर्थात गरीब ब्यक्ति को उस तक आरक्षण की सीधी पहुँच हो जायेगी। क्योंकि गरीबी की कोई जाति, मजहब या धर्म नहीं होता, वो बस और बस गरीबी होती है, बाकी तो सब राजनीति होती है, वो भी गन्दी वाली।
आज की राजनीति में निर्णयों को वोट बैंक को देखते हुये ही लिया जाता है और मोदी सरकार भी इससे अछूती नहीं है, हाँ मोदी सरकार अन्य पिछली सरकारों से इस बात में अलग है कि उसके पास स्पष्ट बहुमत है। कोई भी ठोस निर्णय लेने में बहुमत की सरकार को आसानी होनी चाहिये। पिछले कई वर्षों से आरक्षण के नाम पर सिर्फ राजनीति ही हो रही है, देश हित की नहीं। यहाँ पर निर्णय लेने के लिये सरकार की मंशा में देश हित प्रबल हो ये जनता द्वारा आशा की जा रही है। अभी तक का मोदी सरकार का अधिकांस वक्त कांग्रेस सरकार के निर्णयों को कोसने में ही बीता है या ये कहा जा सकता है कि अभी तक वो अंदर तक ये विश्वास नहीं जगा पायी है कि अभी कमान उसके हाथ में है। तमाम मिसगाइड हो चुकी मिसाइलों को गाइड करने में वो निर्णय ले सकती है, ये विश्वास उसे जगाने में देखते हैं कि उसे अभी कितना वक्त लगता है।
निर्णय लेने के बाद भी उसे लागू किया जाना एक चुनौती भरा कार्य है। इसे ईमानदारी और पारदर्शिता से लागू किये जाने के लिये भी चुनौतियां भरी हुयी मिलेंगी। कहीं ऐसा न हो कि सरकारी आंकड़ों में फेरबदल करके कोई भी ब्यक्ति गरीब बन जाय। इस ब्यवस्था में भी ब्यापक सुधार की आवश्यक्ता है।
राजेश जोशी।






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