वर्तमान शासक वर्ग, नहीं-नहीं जी भगवान को प्यारे हो चुके राजे-महाराजे
अभी कुछ दिन पहले की ही बात है, यही कोई 10-20 दिन पहले की रही होगी कि उत्तराखंड में शासक वर्ग का तानाशाही भरा चेहरा देखने में आया या ये देखना नसीब हुवा भी कहा जा सकता है। इसके साथ एक ऐसा चेहरा भी सामने आया जो आज के दौर के इस ऊटपटांग माहौल में भी अपनत्व को खोज रहा था और न्याय की आशा कर रहा था। इत्तेफाक कुछ ऐसा रहा कि घटना का वीडियो तुरन्त ही वायरल हो गया।
एक महिला जो एक माँ है और अपने बच्चों की इकलौती अभिभावक है इसके साथ-साथ वो सरकारी महकमे में अध्यापन का कार्य भी करती है। पति की असमय मृत्यु के कारण जाहिर है कि काफी टूट गयी होगी और सिफारिश के अभाव में सालों से अपने बच्चों से दूर दुर्गम क्षेत्र में अपनी नौकरी कर रही है। इसके साथ वो ये भी देख रही है कि उसके डिपार्टमेंट में जो रसूखदार लोग हैं और जो अच्छी सिफारिश साथ में रखते हैं, वो आराम से अच्छी जगहों पर लगातार ही अपनी सर्विस कर रहे हैं जहाँ से वो अपनी ड्यूटी के साथ-साथ अपनी अन्य जिम्मेदारियों को भी बड़ी खूबी के साथ निभा ले रहे हैं। उस महिला को भी ये आशा जगती है कि चलो वो सिफारिश इत्यादि नही रखती लेकिन यदि वो अपनी लम्बी दुर्गम क्षेत्रों की नौकरी किये जाने को आघार बनाये और इसके साथ वो अपनी पारिवारिक स्थिति को बताती है तो हो सकता है कि बच्चों की परवरिश करने व उनको उचित मार्गदर्शन देने के लिये उसे भी ऐसी जगह पोस्टिंग मिल जाय जहाँ से वो अपनी सर्विस करने के साथ अपनी अन्य जिम्मेदारियों को उचित तरीके से पूरा कर सके।
वो अपनी इस प्रयास के लिये मुख्यमंत्री के दरबार तक पहुँच गयी तो जाहिर है कि इससे पहले उसने काफी प्रयास किये होंगे जैसे पहले आॅफिस के क्लर्कों के चक्कर लगाये होंगे कि प्रार्थना पत्र अफसर तक पहुँचा दीजिये फिर अफसरों के आॅफिस के चक्कर लगाये होंगे कि उसका प्रार्थना पत्र आगे कर दिया जाय फिर आगे के आॅफिसों तक पहुँची होगी और यही गतिविधियाँ उन आॅफिसों में भी दुहरायी होंगी जैसा कि सरकारी आॅफिसों में होता है फिर ऊँचे ओहदेदारों तक सिफारिश लगाई होगी अन्य भी जो हथकन्डे होते हैं वो सारे अजमा लिये होंगे फिर भी उसे पोस्टिंग नहीं मिल पायी होगी। जब वो हर जगह से मायूस हो गयी होगी तो फिर नेताओं तक सिफारिश लगाई होगी फिर उनके चक्कर लगाये होंगे। अपने द्वारा किये गये प्रयासों से उसने परिणाम निकाल लिया होगा कि पोस्टिंग मिलना मुश्किल है और कई बार असंभव भी लग रहा होगा। वो काफी परेशान भी हो गयी होगी, उसकी आशाओं के टूटने का सिलसिला रूकने का नाम नही ले रहा होगा, सरकारी तंत्र को काफी कोशा भी होगा और कई बार पत्थर पलटा के आयी होगी (उत्तराखंड की कहावत कि जिस काम के लिये ऐड़ी चोटी का जोर लगा दिया हो और वो काम हो नही रहा हो वहाँ कहा जाता है कि तै बाटा म आब ढुंगो फलटा दिना अर्थात इस रास्ते में अब पत्थर पलटा देते हैं या इस काम को अब नहीं करेंगे)। कुल मिलाकर उसने कई बार हार मान ली होगी, लेकिन अपने बच्चों का भविष्य उसे हार नहीं मानने दे रहा होगा। थक हार कर वो सर्विस से ब्रेक लेकर घर भी बैठ गयी। उसे फिर से कोई रास्ता सूझ रहा होगा और फिर से आश जग रही होगी और वो फिर से अपना प्रयास कर रही होगी। आखिरकार उसने सोचा होगा कि अब वो यह बात लेकर मुख्यमंत्री के दरबार में जायेगी आखिर दरबार लगता किसलिये है-लोगों की परेशानियाँ हल हो सकें, उन्हें कोई रास्ता मिल सके इसलिये तोे। ये तो वो बिल्कुल भी नहीं सोचती होगी कि ये दरबार शासन तंत्र अपनी रौब-धौब व तानाशाही दिखाने के लिये करता है।
वो महिला मुख्यमंत्री के दरबार में पहुँचती है काफी बलवती आशा के साथ आखिर बलवती हो भी क्यों न आशा, भई मोदी जी ने काफी सोच विचार करके अच्छे दिन लाने के लिये कई योग्य विधायकों में से इन साहब को मुख्यमंत्री जो बनाया था क्योंकि जनता के सामने तो उनका चेहरा चुनाव के पहले रखा नहीं था इसलिये जनता द्वारा चुना गया मुख्यमंत्री कहना कुछ जंच नहीं रहा है। मोदी जी को योग्यता पसन्द है इस बात को भी कहा नहीं जा सकता क्योंकि योग्य तो दिल्ली के मुख्यमंत्री भी हैं क्योंकि दिल्ली की जनता ने उन पर दूसरी बार भरोशा दिखाया वो भी ऐसा भरोशा कि किसी अन्य को सीटें ही नसीब नहीं हुयी। दिल्ली की जनता जिसमें सारे देश के लोगों को शामिल किया जा सकता है और राजधानी के रहने वाले लोगों को काफी आसानी से बेवकूफ बनाना थोड़ा कठिन भी है अब ऐसे ब्यक्ति को दिल्ली में काम करने नहीं दिया जाता।
महिला तो अपनी समस्याओं से परेशान रही ही होगी मुख्यमंत्री जी को उस वीडियो में देखकर लग रहा था कि वो उस महिला से भी ज्यादा परेशान लग रहे थे शायद लोग उनको बीते जमाने के राजाओं सा सम्मान नही दे रहे होंगे या राजा नहीं समझ रहे होंगे या कोई और बात रही होगी।
कहासुनी कुछ इस कदर बढ़ जाती है कि मुख्यमंत्री जी ने महिला को सस्पेंड करने का आदेश दे दिया और पुलिस को निर्देश दिया कि बाहर करो इसको। वो महिला अपने पर झपटती पुलिस को हटाते हुये इन सरकारी हुक्मरानों को कोसते हुये बाहर की ओर जाने लगी।
घटना के बाद काफी न्यूज चैनलों के माध्यम से यह बात बतायी जाने लगी। उस महिला के मुताबिक वो काफी लम्बे समय से अपनी पोस्टिंग करवाने के लिये प्रयासरत है। फलाने ने उसे ये आश्वासन दिया आदि-आदि। ये सब बताते हुये महिला कई बार रो भी पड़ रही थी। खैर---
मुख्यमंत्री जी ने ये जानना व इसके बारे में सोच विचार करना बिल्कुल भी उचित नहीं समझा कि सामने खड़ी महिला किसी परेशानी से गुजर रही होगी जिसके कारण उसे यहाँ तक आना पड़ा और जो अपनी परेशानी के चलते अपनी नौकरी न करके घर बैठने पर मजबूर हो रही है। इसके साथ जो भी ब्यक्ति यहाँ तक आता होगा इससे पहले वो हर जगह के धक्के खाने के बाद ही आता होगा, ये नहीं कि भईया मुसीबत आ गयी चलो मुख्यमंत्री के दरबार में। उस महिला की मनोस्थिति के बारे में भी मान्यवर ने ध्यान देना तक जरूरी नहीं समझा, अखबार में उनका इंटरब्यू पढा जिसमें वो महिला का मर्यादा में न होने की बात कर रहे थे। जैसा कि यह बात सर्वविदित है कि किसी भी ब्यक्ति से मर्यादित ब्यवहार की आशा की जाती है और की भी जानी चाहिये लेकिन जब कोई ब्यक्ति ब्यथित हो तो ये आशा कई बार अतिश्याक्ति की श्रेणी में भी आ जाती है। यहाँ पर यह बात भी देखने वाली है कि क्या तब मुख्यमंत्री का ब्यवहार मर्यादित था? शायद---
सत्ता के अहंकार में डूबे मुख्यमंत्री जी का ध्यान शायद इस ओर नहीं जा रहा होगा कि जिस जनता के मतों से वो कुर्सी पा गये हैं यदि वो सस्पेंड करने पर आ जाय तो सत्ता पक्ष को विपक्ष की कुर्सी तक नसीब नहीं हो पाती। जैसा कि 2014 के लोक सभा चुनाव में कांग्रेस को विपक्ष में बैठने के लिये भी सीटें नसीब नहीं हुयी। काश ये सत्ता पक्ष इस सबक के साथ आगे बढता तो शायद हमारे देश के अच्छे दिन कुछ नजदीक आ पाते। वैसे अच्छे दिन कब से आने वाले हैं? ये तारीख तो मोदी जी बिना बताये ही 2014 का चुनाव जीत गये वो भी रिकार्ड बनाते हुए, वाह जी वाह।
राजेश जोशी






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