ये दिल्ली है भईया....जरा संभल के


   ये दिल्ली है भईया....जरा संभल के 
 
      दिल्ली बस अड्डे के पास से ही अन्य जगहों के लिये प्राइवेट बसें चलती हैं। ये बस वाले लोग दूर जाने वाले यात्रियों को कई बार अच्छी -खासी परेशानी में डाल देते हैं। कई बार तो से यात्रियों को बीच में ही छोड़ देते हैं। जिससे उनको आगे अपने गंतब्य स्थान में पहुँचने में काफी दिक्कत हो जाती है। बस अड्डे के पास प्राइवेट बसों में बिठाने वाले लोग घूमते रहते हैं। जो लोग खासकर नये हों ये उनके पीछे ही पड़ जाते हैं कि वो उनकी बसों में बैठे और करीब-2 नये लोग ही इनके झांसे में आते हैं। जल्दी घर पहुँचने के चक्कर में फौज के लोग भी इनके साथ हो लेते हैं। मैं भी एक बार इनकी बस में दिल्ली से टनकपुर आने के लिए टिकट ले बैठा।
      बस में बिठाने वाले दो लोग स्टेशन पर ही कुछ यात्रियों से बहस कर रहे थे। ये लोग इन यात्रियों को अपनी बस में बिठाने की कोशिश में लगे हुये थे। यात्री कुछ नये लग रहे थे लेकिन वो इनकी बसों में नहीं जाना चाह रहे थे। फिर भी ये बस वाले उनको तरह-2 की बातों से लुभाने की कोशिश कर रहे थे।
      इन लोगों ने सामने ही खड़ी एक बस की ओर इशारा करके कहा कि वो बस जाने के लिये तैयार खड़ी है। कुछ लोग इनके साथ जाने के लिये तैयार हो गये। पहले इन लोगों सेे टिकट लेने को कहा। वो जितने भी लोग थे सबने टिकट ले लिया। इसके बाद इन लोगों ने सभी को बस के एक ओर खड़ा होने को कहा और अपना नये यात्रियों को खोजने जाने लगे। यात्रियों ने पूछा कि अभी तक तो आप कह रहे थे कि ये बस जाएगी, तो उनका जबाब था कि वो बस इससे पहले जाएगी।
      कुछ देर बाद वो लोग जो टिकट ले चुके थे उनमें से कुछ अब उन बस में बिठाने वालों के पास गए और उनसे  बस के बारे में पूछने लगे। वो लोग अब कहने लगे कि आप लोग वहीं पर खडे़ रहो जहाँ आप लोगों को बताया है,  बस कुछ देर में आ रही है। अब उनका बात करने का लहजा बदल गया था। क्योंकि अब वो लोग टिकट बेच चुके थे।
      सभी लोग काफी समय तक खड़े रहे। इस बीच नये यात्री भी आ रहे थे। ये बस वाले उनसे भी पैसा ले रहे थे और उनको टिकट पकड़ा दे रहे थे। नये यात्रियों को भी पुराने यात्रियों के साथ खड़ा होने को कहा जा रहा था। टिकट लिये हुये लोगों में से कुछ कह रहे थे कि इन बस वालों का कोई भरोशा नहीं है कहीं अंत में ये ना बोल दें कि अब गाड़ी नहीं जायेगी और ऐसी हालत में हम लोगों को सरकारी गाड़ी मिलने में मुश्किल हो जायेगी।
      काफी समय तक खड़े रहने के बाद कुछ लोग अपना टिकट वापस करना चाह रहे थे, लेकिन ये बस वाले लोग बोल रहे थे कि अब टिकट वापस नहीं होगा। टिकट लिये हुए व्यक्तियों में दो लोग साथ-2 थे। वे टिकट वापस लेने के लिये जोर करने लगे। उन दोनों की बस वालों से बहस होने लगी। बात हाथापाई तक पहुँच गयी। लेकिन बस वाले पैसा वापस नहीं कर रहे थे। इतने में बस वालों के कुछ और साथी भी आ गये। वो भी बोलने लगे कि पैसा वापस नहीं होगा। वो दोनों व्यक्ति जो अभी जक पैसा वापस माँग रहे थे वो भी चुप हो गये। क्योंकि बस वालों की संख्या ज्यादा हो गयी थी।
      कुछ देर बाद बस आ गयी। जिसमें कुछ यात्री पहले से बैठे थे, सभी लोगों को उसमें बैठने को कहा गया। टिकट में बस नंबर लिखे थे। टिकट लेते समय जिस व्यक्ति को जो सीट चाहिये थी उसके टिकट में वो नंबर लिख दिया था। ये सिर्फ यात्री कैसे भी टिकट ले लें इसलिये था। अब उन नंबरों का कोई मतलब नहीं रह गया था क्योंकि एक ही नंबर कई यात्रियों के टिकटों पर था और उन सीटों भी पर पहले से ही यात्री बैठे हुये थे।
      खैर बस भरने के बाद चल दी। सुबह करीब 3 बजे एक ढ़ाबे पर बस रूकी पता चला कि ये जगह खटीमा के पास ही है। अब बस वाले बोलने लगे कि बस आगे नहीं जायेगी। जबकि कुछ लोगों के पास आगे का टिकट था और कुछ यात्री पीछे के स्टेशनों पर उतर गये थे। अब इन लोगों से बहस करने से तो कुछ फायदा नहीं था। उल्टा अगर कोई यात्री कुछ बोले तो इनका बोलने का मिजाज ऐसा था कि ये लड़ाई के लिए तैयार हों, इसलिये सभी यात्री बस से उतर गये। इतनी सुबह-2 आगे के लिए बस भी मिलना मुश्किल था। सभी लोगों ने ऐसे ही खड़े-2 स्टेशन पर कुछ समय गुजारा और कुछ समय के बाद बसें आने लगी। कुछ लोग बसों से और कुछ लोकल जीपों से आगे के सफर के लिये बस स्टैंड की ओर जाने लगे। उस  बस में सफर कर रहे लोगों ने उस दिन सबक ले लिया और कहने लगे कि अब कभी इनकी बसों में नहीं जायेंगे चाहे कुछ देर इंतजार करना पड़ जाये, सरकारी बसों से ही जाना ठीक रहता है।
      वैसे हाल सरकारी बसों का भी कोई खास ठीक नहीं रहता,  हाँ इस लिहाज से काफी अच्छा रहता है कि चाहे यात्री कितने ही कम क्यों हों से गंतब्य स्थान तक पहुँचा ही देते हैं। लेकिन ये जहाँ पर खाना आदि खिलाने के लिये रोकते हैं वहाँ पर ये भी अपने दर्शन करवा ही देते हैं। खाने के होटलों से ड्राईवर और कंडक्टर को बस रोकने के लिये पैसा दिया जाता है और इसके साथ इनको खाना भी स्पेशल दिया जाता है, जो इन लोंगों के लिये अलग से बनाया जाता है। शराब के शौकीन हों तो उसका भी इंतजाम रहता है। अन्त में जाते समय टिप के रूप में पैसे का लिफाफा भी इनको पकड़ा दिया जाता है।
      इन होटलों में यात्रियों को पहले टोकन लेने को कहा जाता है उसके बाद खाने की टेबल पर टोकन के बदले खाने की थाली दी जाती है। कई बार क्या तक़रीबन हमेशा ही यहाँ पर ऐसा होता है कि पहली बार में जो खाना दे दिया जाता है उसी से गुजारा करना पड़ता है। क्योंकि खाना देने वाले दुबारा आते ही नहीं हैं। लोग आवाज दे-देकर थक जाते हैं लेकिन होटल वालों के कान में जूं नहीं रेंगता। सभी बसें तकरीबन एक ही समय में खाना खाने के लिये रूकती हैं। जबकि खाना खासकर रोटियां सीमित मात्रा में ही बनी रहती हैं और होटलों में काम करने वाले कारीगर व अन्य सभी लोग रोटी बनाने में लग जाते हैं। कुछ रोटियाँ बनती हैं तो वो इतने लोगों के लिये कुछ भी नहीं होती हैं। इसके बाद भी अगर नये ग्राहक आये तो ये उनको टोकन बेच देते हैं। इस सबसे बस के ड्राईवर-कंडक्टर को कुछ भी लेना-देना नहीं रहता है क्योंकि उनको तो जो वो चाहते हैं मिल ही जाता है। खाने की इस अव्यवस्था के चलते कुछ लोग घर से ही खाना लेकर चलते हैं वैसे भी इन होटलों में खाने का टोकन भी मंहगा रहता है। यहाँ पर ये होटल वाले कुछ सरकारी अफसरों को रिश्वद आदि देकर गाड़ी अपने ही होटल में रूके वो ब्यवस्था कर लेते हैं अर्थात सरकारी आदेश करवा लेते हैं, और ड्राईवर-कंडक्टर अगर चाहें भी तो वो अन्य जगहों पर खाने के लिये गाड़ी नहीं रोक सकते, उनको यहाँ पर हाजिरी लगानी ही होती है।
      इसी तरह की प्राइवेट बसें हमारे देश के पूर्वात्तर के राज्यों में भी काफी चलती हैं। मैं खुद अपनी फौज में सर्विस के दौरान वहाँ पर रहते हुये जैसे मणीपुर, त्रिपुरा आदि जगहों से छुट्टी आने-जाने में इन्हीं बसों से सफर करता था। गोवाहाटी से हर जगह के लिये ये बसें उपलब्ध हो जाती है । वहाँ पर ऐसा गदर नहीं होता, बल्कि उनकी काफी अच्छी व्यवस्था होती है। इन लोगों की तरह वो एक-2 यात्री के पीछे नहीं भागते हैं। व्यवस्था अच्छी होने के कारण एक दिन पहले ही इनकी बसों के टिकट बिक जाते थे। शायद वो गाना 'ये पूरब है पूरब वाले हर जान की कीमत जानते हैं' इसीलिए बना था। वहां पर टिकट में बस चलने का समय, स्थान और सीट नंबर दिया होता है जो एकदम सही होता है। बस के साथ उनके स्टाफ के जो सदस्य होते हैं वो यात्रियों से काफी तहजीब से बात करते हैं और रास्ते में भी अपने यात्रियों काफी अच्छे से खयाल रखते हैं । ऐसा नहीं कि नहीं कि एक बार टिकट बिक गया तो अपने नाटक शुरू कर दो इन दिल्ली वालों की तरह। शायद वो लोग अपने कारोबार को लम्बे समय तक चलाना चाहते हैं और वो इतनी अच्छी तरह पेश आते हैं कि जो ब्यक्ति उन बसों में यात्रा कर रहा हो वो अगली बार भी इन्हीं बसों से सफर करता है और दूसरों को भी इन्हीं से सफर करने की सलाह देता है।
      हालांकि तब वहाँ पर भी सरकारी बसें चलती हैं और उनका टिकट भी प्राइवेट बसों की तुलना में कम होता है। फिर भी लोग प्राइवेट बसों में ही सफर करना पसंद करते हैं। क्योंकि रात भर का सफर रहता है  और इनकी बसों की सीटें भी काफी अच्छी होती है व अन्य ब्यवस्थाएं भी काफी अच्छी रहती हैं।
     काश ये दिल्ली की प्राइवेट बसों को चलाने वाले उन लोगों से कुछ सीखते तो शायद एक-2 यात्री के पीछे भागने की जगह यात्री खुद ही इनके पास आते। लेकिन अफसोस इन लोगों ने ऐसा माहौल पैदा कर दिया है कि जो आदमी एक बार इनके चंगुल में फंस जाता हो और इनकी असलियत से वाकिफ हो जाता हो वो शायद दुबारा इन बसों से सफर करने के लिये कान ही पकड़ लेता होगा और जाहिर है कहीं पर मौका आने पर अपने परिचितों को भी इनका किस्सा जरूर सुनाता होगा।
      कई स्थानों पर मूली की खेती को अच्छा नहीं माना जाता है। उसकी जगह घनियाँ और मेथी की खेती करना अच्छा माना जाता है। क्योंकि मूली को सिर्फ एक ही बार उखाड़कर खाया जाता है जबकि धनियाँ और मेथी को तोड़-तोड़कर बार-बार खाया जा सकता है। एक पुरानी कहावत भी है कि ‘‘उखाड़कर खाने से तोड़ तोड़ कर खाना अच्छा होता है। उत्तराखंड में बुजुर्ग लोग अभी भी कहते हुए मिल जायेंगे 'इजा चूड़ी बेर खानों निक भयो'।क्योंकि ऐसे करके कई दिनों तक खाया जा सकता है।
      यहाँ पर ये दिल्ली के बस वाले एक ही बार खा जाने के चक्कर में रहते हैं। जबकि ऊधर पूर्वोत्तर के बस वाले अपने व्यवहार और व्यवस्था से बार-2 यात्रियों को आकर्षित कर लेते हैं।

                                                                                                                                             राजेश जोशी।
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