कब हटेगी ये संध्या-----
एक दिन शाम का वक्त हो रहा था। एक गाँव की कुछ लड़कियाँ गाँव के पास ही नदी में नहाने गयी और नहाने लगी। नदी की लहरों के साथ खेलते-2 शाम गहराने लगी। उन लड़कियों में से एक लड़की बोली कि जल्दी घर की ओर चलो, नही तो संध्या लग जायेगी। नदी के पास ही झाड़ियों में एक शेर था। उसने भी ये सुन लिया कि ‘‘जल्दी चलो नही तो संध्या लग जायेगी’’।
लड़कियाँ नदी से बाहर निकली और जल्दी -2 गाँव की ओर जाने लगी। वो आपस में बातें करती हुयी जा रही थी कि आज उनको काफी देर हो गयी है, आज समय का पता ही नहीं चला अब जल्दी ही संध्या लग जायेगी। वो बातें ऐसे कर रही थी जैसे वो काफी चिन्तित हो गयी हों।
शेर उनकी बातें काफी गौर से सुन रहा था। उसने सोचा पता नहीं ये संध्या कौन सी बला है कहीं उसे ही न लग जाये। शेर भी उन लड़कियों के पीछे-2 चल दिया।
गाँव पहुँचने पर सभी लड़कियाँ अपने-2 घरों की ओर चली गयी।
इधर शेर अकेला पड़ गया। अब वो कहाँ जाये? उसने इधर-उधर देखा लेकिन उसे अपने लिये कोई जगह नजर नहीं आयी। वो जगह की तलाश में इधर-उधर घूमने लगा।
घूमते -2 वो शेर गधों के तबेले के पास पहुँच गया। शेर अब तक संध्या वाली बात को सोचते हुये काफी परेशान हो गया था। शेर गधों के तबेले में घुस गया और उसे अंदर गधों के बीच में एक जगह मिल गयी। शेर वहीं जाकर बैठ गया।
शेर ने पूरी रात गधों के तबेले में गुजार दी। सुबह जब कुछ अंधेरा ही था तो गधों का मालिक तबेले में आया और उसने गघों पर बोझ लादना शुरू कर दिया।
एक बोझ उसने अंधेरे में ही शेर की पीठ पर भी रख दिया। गधों को तो इसका अभ्यास था वो तो बोझ रखते हुये खामोश खड़े रहे। लेकिन शेर को तो इसका कोई भी अभ्यास नहीं था। बोझ रखते हुये वो अपनी जगह से कुछ हिला तो मालिक ने अंधेरे में ही एक डंडा उस पर दे मारा। शेर भी अब खामोश हो गया।
बोझ रखने के बाद गधों के मालिक ने गधों को बाहर की ओर हांकना शुरू कर दिया। गधे बाहर जाने लगे। शेर भी अंधेरे में उन गधों के बीच हो गया और बोझ उठाकर गधों के साथ-2 चलने लगा। मालिक उन सबके पीछे हो लिया।
गधे अपनी धुन में चल रहे थे। न बायें देखना, और न दायें। शेर भी उनके बीच में चल रहा था।
सुबह जब आस-पास दिखाई देने लगा तो रास्ते में झाड़ियों में बैठे दूसरे शेर ने देखा कि गधों के साथ शेर भी बोझा उठाकर उनके बीच में चल रहा है। सहसा उसे अपनी आँखों पर विश्वास नहीं हुवा। उसने अपनी आँखों को एक-दो बार मींचा और फिर देखने लगा। फिर भी उसे बोझ उठाया हुवा शेर दिखाई दिया।
अब ये शेर रास्ते के किनारे-2 झाड़ियों के बीच चलता हुवा उस शेर के करीब जाने लगा और अपनी भाषा में सी-2 करते हुये बोझ वाले शेर का ध्यान अपनी ओर करने की कोशिश करने लगा।
दूसरा शेर गधों की ही भाँति बोझ उठाकर चल रहा था। अचानक एक बार उसकी नजर झाड़ियों के अंदर चल रहे दूसरे शेर पर पड़ गयी। कुछ देर तो उसने उससे नजरें मिलाये रखी फिर उसने झटके से अपना ध्यान उससे हटा लिया और चलने लगा।
झाड़ियों वाला शेर फिर झाड़ियों के बीच चलता हुवा अपनी भाषा में बोझ वाले शेर को पुकारने लगा। लेकिन उसका वही हाल था।
कुछ देर बाद बोझ वाला शेर झाड़ियों के करीब से होता हुवा चलने लगा तो दूसरे शेर को उससे बात करने का मौका मिल गया। उसने पूछा कि क्या बात है भई? तू गधों के साथ बोझ उठाकर क्यों चल रहा है?
बोझ वाला शेर धीरे से बोला- अरे यार मुझे संध्या लग गयी है। इस चक्कर में मुझे सुबह-सुबह एक डंडा भी पड़ गया है। तू यहाँ से भाग जा नहीं तो तुझे भी संध्या लग जायेगी और तेरा भी हाल मेरी तरह हो जायेगा।
थोड़ी देर के लिये तो उस शेर का दिमाग चकराया और वो भी सोचने लगा कि पता नहीं ये संध्या क्या बला है? फिर थोड़ी देर सोच विचार करने के बाद उसने बोझ वाले शेर से कहा-कहीं तू पागल तो नहीं हो गया है?
बोझ वाला शेर बोला-भाग जा मेरे भाई। ये संध्या बहुत खतरनाक होती है और ये जिसे लग गयी वो गया काम से। इसके चक्कर में मुझे जो डंडा पड़ा अभी तक उसका दर्द हो रहा है।
झाड़ी वाला शेर बोला- अरे यार एक बार तू दहाड़, न ये संध्या रहेगी, न ये गधे रहेंगे और न गधों का मालिक रहेगा।
बोझ वाला शेर उसकी बात मानने को बिल्कुल भी राजी नहीं हो रहा था। बस उसने एक ही रट लगाई हुयी थी जो वो दूसरे शेर से कह रहा था कि-भाई तू भाग जा। कहीं तुझे न लग जाये ये संध्या।
दूसरा शेर झाड़ियों में उसके बराबर चलता हुवा उससे कहे जा रहा था कि एक बार दहाड़ तो सही।
बोझ वाले शेर की बात तो समझ में नहीं आ रही थी। फिर भी दूसरे शेर के जोर करने और पीछे पड़े रहने के कारण उसने दहाड़ मार दी।
अब न गधे रहे और न ही गधों का मालिक उसे अपने आस-पास नजर आया। उसने दुबारा दहाड़ मारने के साथ उछलते हुये अपना बोझ भी गिरा दिया। उसकी संध्या गायब हो गयी थी।
इस बोझ वाले शेर की तरह ही हमारे नेताओं का हाल हो जाता है। चुनाव का समय ले लीजिये क्या-2 बोल़ते फिरते हैं और जनता को एक बार फिर से बेवकूफ बना देते हैं। जनता फिर उन पर विश्वास कर लेती है कि चलो इस बार तो ये सब ठीक कर ही देंगे।
चुनाव जीतने के बाद जब ये अपने पद की शपथ लेते हैं तो ये संध्या की चपेट में आ जाते हैं और भूल जाते हैं कि जनता ने उनको अपना प्रतिनिधि बनाया है और अपने किये हुये सारे वादों को भुलाकर पुरानी सरकार को कोसते हुये, घोटालों के पुराने रिकार्डों को तोड़ने में लग जाते हैं और इस कोशिश में लग जाते हैं कि उनके घर तो भर जायें। फिर अगले चुनावों के खर्च की ब्यवस्था भी तो उनको करनी होती है।
अब इनकी संध्या कैसे भागे? कौन भगाये उसे? साथ के नेताओं का और बुरा हाल रहता है। अगर विपक्ष इस मामले में काम करे और कहीं इनकी संध्या उतर जाये तो अगले चुनावों में भी विपक्ष की हार निश्चित है। क्योंकि ये नेता अच्छा काम करने लगे तो अगले चुनावों में भी उनकी जीत पक्की है। ये बात विपक्ष किसी हाल में बर्दाश्त नहीं करना चाहता। इसलिये विपक्ष तो ज्यादा से ज्यादा उसे संध्या की ओर धकेलने की कोशिशों में लगा रहता है।
काश कैसे ही सही ये नेता दहाड़ देते तो क्या समस्या है कश्मीर या अन्य किसी आतंकवाद की। रास्ते खुद ब खुद निकल आते। अगर ना निकल पायें तो वो क्षमता भी है हमारे पास जिससे न आतंकवादी रहते न उनके आका रहते और न वो मुल्क रहता जो आतंकवाद का शह दे रहा है। इसके साथ-2 भ्रष्टाचार जो हमारे देश में मजबूती से अपनी जड़ जमाये हुए है। ये नेता गण पीछे पड़ जाते कि कैसे ये सब जड़ से समाप्त हो।
ऐसा ही कुछ हाल हमारे देश के वर्दीधारी हुक्मरानों का हो जाता है। अक्सर फौज में किसी यूनिट में कोई सीनियर अफसर आता है तो वो दरबार लेता है और वो बोलने लगता है पता नहीं वो क्या-2 कर देगा। नीचे के रैंक के आदमी उसके झांसे में आ जाते हैं। क्योंकि उनको भी जनता की ही तरह उसके झांसे में आना अच्छा लगता है। वो भी सोचने लगते हैं काफी समय से वो जैसे अफसर चाह रहे थे उनको इस बार वैसा अफसर मिल गया है। लेकिन कुछ ही दिनों में से भी संध्या की चपेट में आ जाता है। इसके कारण अब वो-
1- जवानों की समस्या सुलझाने की जगह गाली-गलौज पर उतर जाता है।
2- आपरेशनों में कम से कम या बिल्कुल नहीं जाता है।
3- अपने क्षेत्र और अपनी पोस्टों की स्थिति जाकर देखने के स्थान पर कागजों के आधार पर ही निर्णय लेने लगता है।
4- जिस क्षेत्र में उसको निर्णय लेने हैं उसके पास उस क्षेत्र की समुचित जानकारी ही नहीं होती।
5- वो लोग जो ईमानदारी से अपना काम करते हैं उनको नीचा दिखाने की फिराक में लगे रहता है।
6- बोर्डर पर तस्करी कराने लगता है।
7- आत्मसमर्पण करने वाले आतंकवादियों और कई बार तो निर्दोष लोगों को मारकर अपनी बहादुरी का ढिढोरा पीटने लगता है।
8- शरीफ लोगों पर रौब दिखाने लगता है और बेईमान और आतंकवादियों से हाथ मिला लेता है।
कुछ ऐसा ही हाल हमारे देश की पुलिस ब्यवस्था का हो जाता है।
ये लोग दहाड़ देते तो क्या आतंकवादी घटनायें घट सकती हैं? और क्या आतंकवादी अपने नापाक मकसदों में कामयाब हो पाते? ......... कभी नहीं, बल्कि आतंकवादी पैदा ही होना बंद हो जायेंगे।
एक दृष्टि क्यों न सरकारी नौकरी करने वालों पर डाल लें। क्योंकि देश को सुचारू रूप से चलाने में इनका भी अहम योगदान होता है। सरकार की कार्यप्रणाली और नीतियों को आम जनता तक ये ही पहुँचाते हैं। लेकिन यहाँ भी संध्या आ पहुँचती है। जिसके कारण ये-
1- भ्रष्टाचार में लिप्त हो जाते हैं।
2- सरकार द्वारा दी गयी शक्तियों का दुरूपयोग करने लगते हैं।
3- सरकार की नीतियों को आम आदमी तक पहुँचने ही नहीं देते हैं।
4- गरीब और असहाय लोगों को मिलने वाली सहायता को खुद ही डकार जाते हैं।
5- अन्य अनुचित तरीकों से पैसा कमाने की फिराक में लगे रहते हैं।
ये दहाड़ देते तो शायद हमारे देश से गरीबी, भुखमरी आदि दूर हो जाती। इन सबको दहाड़ता देखकर शायद वो जड़बुद्धि लोग भी होश में आ जाते जो धर्म, जाति, ऊँच-नीच व अन्य दूषित विचारों द्वारा समाज के लोगों को एक-दूसरे से दूर करने के फिराक में लगे रहते हैं।
इस सबके बावजूद, इन लोगों में जो ईमानदार और कर्तब्य निष्ठ लोग हैं उनकी बदौलत हमारा देश दुनियाँ में काफी अच्छा नाम रखता है।
क्या ही अच्छा हो जाता कि ये संध्या लगे हुये सभी लोग दहाड़ देते और उन लोगों में शामिल हो जाते जो ईमानदार और कर्तब्यनिष्ठ हैं। अगर ऐसा हो जाये, तो क्या बुलन्दियाँ हमसे पीछे नहीं रह जायेंगी? और तब शायद किसी विकसित देश से हमें अपने देश की तुलना करने की आवश्यक्ता नहीं पड़ती।
शायद तब विश्व के अन्य देश भी हमारा अनुशरण करते और एक बेहतरीन दुनियाँ का विकास हो पाता। इस हसीन दुनियाँ को बनाने में हमारा देश एक नींव का पत्थर कहलाता।
राजेश जोशी।






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